विरोधाभासी बयान बढ़ा सकते हैं कूटनीतिक परेशानी
केंद्रीय गृहमंत्रालय, रक्षा मंत्रालय और विदेश मंत्रालय के बयानों में विरोधाभास परेशानी बढ़ा सकता है। विदेश मंत्रालय 28 अगस्त 2020 से पहले कई बार वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन को शांति और सौहार्द बनाए रखने के लिए अपनी फौज को वास्तविक नियंत्रण रेखा से पीछे ले जाने की अपील कर चुका है। 15 जून को गलवां घाटी में हिंसक झड़प के बाद विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अपने समकक्ष वांग यी से वार्ता में भी इस मुद्दे को उठाया था।
चीन से अंतरराष्ट्रीय समझौतों, सहमतियों, द्विपक्षीय स्तर की सहमतियों, समझौतों के अनुपालना की अपील की थी। विदेश मंत्री के बाद 5 जुलाई को दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों ने वार्ता की। इसमें गलवां घाटी में दोनों देशों की सेनाएं कुछ पीछे हटीं और खाली हुए क्षेत्र को बफर जोन बनाने पर सहमति बनी। इतना ही नहीं इसी दौरान चीन ने अपनी सैन्य तैनाती घटाने और सैनिकों को पुराने स्थाई तैनाती वाले स्थल पर ले जाने पर सहमति जताई थी। इसके बाद रक्षा मंत्रालय ने अपनी वेबसाइट पर चीन फौज द्वारा वास्तविक नियंत्रण रेखा के उल्लंघन का जिक्र किया। बाद में इसे हटा लिया।
फिर क्यों मची है इतनी हाय तौबा?
चीन की फौज ने पिछले छह महीने में घुसपैठ नहीं की है तो इतनी हाय तौबा क्यों मची है? बड़ा सवाल है। सेना से रिटायर अफसरों को भी यह बात जरा कम समझ में आ रही है। रक्षा मामलों के संवाददाता रंजीत कुमार का भी कहना है कि फिर इतना हो हल्ला क्यों मचा है? रंजीत कुमार का भी मानना है कि इस तरह का विरोधाभास समझ में नहीं आ रहा है।
घुसपैठ का प्रयास कहना ही सही
रक्षा मंत्रालय के वरिष्ठ सूत्र का कहना है कि भारत और चीन के बीच में सीमा का स्पष्ट निर्धारण नहीं हुआ है। सीमा का एक बड़ा हिस्सा विवादित और वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी ) परसेप्शन पर आधारित है। इसकी स्थिति भाररत-पाक नियंत्रण रेखा (लाइन ऑफ कंट्रोल, एलओसी) से भिन्न है। इसलिए इसे घुसपैठ कहना तकनीकी रूप से गलत होगा। चीन भारत के हिस्से पर अपना और भारत चीन के कई हिस्से पर अपना दावा जताता है। इसलिए इसे चीन सैनिकों द्वारा घुसपैठ का प्रयास ही कहना सही रहेगा। सूत्र का कहना है कि यही वजह है कि भारत अपने अधिकारिक दस्तावेजों में घुसपैठ का प्रयास ही कह रहा है।