बिलकिस बानो मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को बड़ी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि कुछ दोषी ऐसे हैं जिन्हें अधिक विशेषाधिकार मिले हुए हैं। कोर्ट 2002 के गुजरात दंगों के दौरान बिलकीस बानो से सामूहिक दुष्कर्म और उनके परिवार के सात सदस्यों की हत्या के मामले में 11 दोषियों की समय-पूर्व रिहाई के फैसले को चुनौती देने संबंधी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी
दोषियों में से एक ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि दोषियों के सुधार और पुनर्वास के लिए सजा में छूट देना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक तय स्थिति है। बिलकीस बानो और अन्य की यह दलील कि अपराध की जघन्य प्रकृति के कारण उसे राहत नहीं दी जा सकती, अब कार्यपालिका के फैसले के बाद मान्य नहीं हो सकती।
जस्टिस बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने दोषी रमेश रूपाभाई चंदना की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा से कहा कि हम छूट की अवधारणा को समझते हैं। यह सर्वमान्य है, लेकिन यहां पीड़ित और अन्य वर्तमान मामले में इस पर सवाल उठा रहे हैं।
पीठ ने कहा कि आमतौर पर राज्यों की ओर से इस तरह की छूट से इनकार किए जाने के खिलाफ मामले दायर किए जाते हैं। वहीं, लूथरा ने कहा कि कानूनी स्थिति और नीति वही बनी हुई है। उन्होंने कहा कि आजीवन कारावास की सजा के दोषियों का पुनर्वास और सुधार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक स्थापित स्थिति है। कोर्ट अब 20 सितंबर को याचिकाओं पर सुनवाई फिर से शुरू करेगा।
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 17 अगस्त को गुजरात सरकार से कहा था कि राज्य सरकारों को दोषियों को सजा में छूट देने में चयनात्मक रवैया नहीं अपनाना चाहिए। प्रत्येक कैदी को सुधार तथा समाज के साथ फिर से जुड़ने का अवसर दिया जाना चाहिए। गुजरात सरकार ने मामले के सभी 11 दोषियों की समय-पूर्व रिहाई के अपने फैसले का बचाव किया था।