सुप्रीम कोर्ट ने सोहराबुद्दीन शेख, उनकी पत्नी कौसर बी और सहयोगी तुलसीराम प्रजापति की कथित फर्जी मुठभेड़ मामले में 22 आरोपियों को नोटिस जारी किया है। इनमें 21 पुलिसकर्मी हैं। नोटिस सीबीआई को भी भेजा गया है। सोहराबुद्दीन के भाई रुबाबुद्दीन शेख ने शीर्ष अदालत में बंबई हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी। मामले की अगली सुनवाई 28 अक्तूबर को होगी।
रुबाबुद्दीन ने किस फैसले को चुनौती दी?
दिसंबर 2018 में विशेष सीबीआई अदालत ने सभी 22 आरोपियों को बरी कर दिया था। इसके खिलाफ सोहराबुद्दीन के भाइयों ने बंबई हाईकोर्ट में अपील की, लेकिन हाईकोर्ट ने सात मई को निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए अपील खारिज कर दी। अब रुबाबुद्दीन ने इसी फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। उनके वकील ने बताया कि एक अन्य भाई नायबुद्दीन शेख ने भी याचिका दायर की है और दोनों मामलों को साथ सुनने का अनुरोध किया है।
मामले को विस्तार से समझने के लिए जरूरी बातें
- 92 गवाह मुकर गए: केस की जांच के दौरान कुल 210 गवाहों से पूछताछ हुई, जिनमें 92 गवाह अपने पहले के बयानों से मुकर गए।
- सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता: पीठ ने कहा कि 92 गवाहों का मुकरना गंभीर चिंता का विषय है और वह कुछ गवाहों के बयान देखना चाहती है।
- निष्पक्ष सुनवाई पर सवाल: शीर्ष अदालत ने कहा कि दोनों निचली अदालतों में बरी होने के फैसले के बावजूद यह देखना जरूरी है कि मुकदमा निष्पक्ष और न्यायपूर्ण तरीके से चला या नहीं।
- आरोपियों की दलील: कुछ आरोपियों की ओर से कहा गया कि बरी किए जाने के दो फैसले विस्तार से दिए गए हैं और मामले की जल्द सुनवाई होनी चाहिए।
- अमित शाह पर सुनवाई नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि वह इस मामले में अमित शाह को दिसंबर 2014 में मिली मुक्ति को चुनौती देने वाले हिस्से पर सुनवाई नहीं करेगा।
- मामला सुप्रीम कोर्ट तक कैसे पहुंचा?: गुजरात पुलिस की शुरुआती जांच के बाद सुप्रीम कोर्ट ने जांच सीबीआई को सौंप दी और 2012 में मुकदमे को गुजरात से मुंबई स्थानांतरित कर दिया।
- निचली अदालत का निष्कर्ष: 21 दिसंबर 2018 को विशेष सीबीआई अदालत ने कहा था कि अभियोजन पक्ष साजिश और हत्या के आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर पाया।
92 गवाहों के मुकरने पर शीर्ष अदालत ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने खास तौर पर 92 गवाहों के मुकरने का मुद्दा उठाया। शीर्ष अदालत ने कहा, '92 गवाहों का मुकरना गंभीर चिंता का विषय है। हालांकि यह बरी किए जाने का समान निष्कर्ष है, लेकिन क्या सुनवाई निष्पक्ष और न्यायपूर्ण थी, इस पर विचार करना होगा। हम कुछ गवाहों के बयान देखना चाहते हैं और खुद संतुष्ट होना चाहते हैं।'
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सोहराबुद्दीन, कौसर बी और तुलसीराम के साथ क्या हुआ था?
जानकारी के मुताबिक, 22-23 नवंबर 2005 की रात सोहराबुद्दीन शेख, कौसर बी और तुलसीराम प्रजापति को हैदराबाद से सांगली जा रही एक लग्जरी बस से कथित तौर पर अगवा किया गया था। आरोप है कि नवंबर 2005 में गुजरात और राजस्थान पुलिस की संयुक्त टीम ने अहमदाबाद के पास सोहराबुद्दीन को कथित फर्जी मुठभेड़ में मार दिया। कुछ दिन बाद कौसर बी की भी कथित तौर पर हत्या कर दी गई और उनके शव को गुप्त रूप से ठिकाने लगाया गया। इसके बाद दिसंबर 2006 में गुजरात-राजस्थान सीमा पर तुलसीराम प्रजापति की भी कथित फर्जी मुठभेड़ में मौत हो गई।
22 आरोपी बरी क्यों हुए ?
21 दिसंबर 2018 को विशेष सीबीआई न्यायाधीश एसजे शर्मा ने सभी 22 आरोपियों को बरी कर दिया था। अदालत ने कहा था कि अभियोजन पक्ष साजिश और हत्या के आरोपों को संदेह से परे साबित करने में नाकाम रहा। आरोपियों को केवल नैतिक आधार या संदेह के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता। बंबई हाईकोर्ट ने भी 7 मई को इस फैसले को बरकरार रखा। अब सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई और 22 आरोपियों को नोटिस जारी किया है और 28 अक्टूबर को मामले की आगे सुनवाई होगी।