ट्रैफिक नियम तोड़ने के बाद ई-चालान भरने में लापरवाही करने वालों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सख्त कदमों पर विचार करने को कहा है। अदालत ने सुझाव दिया कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को बकाया ई-चालान की रकम वसूलने के लिए व्यावहारिक तरीके तलाशने चाहिए। इनमें बकाया चालान को बिजली बिल से जोड़ने का सुझाव भी शामिल है।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ सोमवार को एस. राजसीकरन बनाम भारत संघ मामले में ई-चालान और ट्रैफिक नियमों के इलेक्ट्रॉनिक प्रवर्तन से जुड़ी याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
सिर्फ ई-चालान काटना काफी नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुनवाई के दौरान जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि सिर्फ बड़ी संख्या में ई-चालान जारी करना पर्याप्त नहीं है। असली सवाल इन चालानों पर लगाई गई जुर्माने की रकम की वसूली का है। अदालत ने सुझाव दिया कि अगर लोग ट्रैफिक चालान नहीं भर रहे हैं तो बकाया रकम को बिजली के बिल से जोड़ने की व्यवस्था पर विचार किया जा सकता है। इससे बकाया चालान जमा कराने के लिए अतिरिक्त प्रोत्साहन मिल सकता है। कोर्ट ने कहा कि अगर लोग ट्रैफिक चालान नहीं भर रहे हैं, तो इसे उनके बिजली के बिल में जोड़ दें। उन्हें बिजली का बिल भरना होगा, नहीं तो बिजली की लाइन काट दी जाएगी।
कोर्ट ने पूछा- 14 साल के निर्देशों का जमीन पर क्या असर?
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि करीब 14 वर्षों से दिए जा रहे निर्देशों का वास्तविक स्तर पर कितना पालन हुआ है। कोर्ट ने कहा कि अगर निर्देश सिर्फ कागजों तक सीमित रहेंगे और उनका पालन नहीं होगा तो आगे सख्त कदम उठाने की स्थिति आ सकती है।
अदालत ने वरिष्ठ अधिवक्ता और अमिकस क्यूरी गौरव अग्रवाल से निर्देशों की स्थिति बताने वाला एक चार्ट तैयार करने को कहा है। इसमें अब तक जारी निर्देश, उन्हें लागू करने के लिए दिया गया समय, वर्तमान स्थिति और अमिकस की टिप्पणियां शामिल होंगी। इस मामले में आगे की कार्यवाही के दौरान बकाया ई-चालान की वसूली और सड़क सुरक्षा से जुड़े उपायों पर अदालत की दिशा स्पष्ट हो सकती है।
45 हजार करोड़ रुपये के ई-चालान बकाया
अदालत को बताया गया कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के स्तर पर करीब 45,000 करोड़ रुपये के ई-चालान की रकम वसूलना बाकी है। इनमें से करीब 25,000 करोड़ रुपये की वसूली हो चुकी है। इसी पृष्ठभूमि में अदालत ने बकाया चालानों की वसूली के लिए कई संभावित उपायों पर चर्चा की।
वाहन से जुड़े काम भी रुक सकते हैं
सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया कि जिन वाहनों पर चालान बकाया हैं, उनके लिए कुछ वाहन संबंधी सेवाओं को रोका जा सकता है। इनमें वाहन के रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट के नवीनीकरण, डुप्लीकेट सर्टिफिकेट जारी करने और मालिकाना हक में बदलाव जैसी सेवाओं को बकाया चालान से जोड़ने पर विचार किया गया। अदालत ने परिवहन पोर्टल पर ऐसे वाहनों को ब्लैकलिस्ट करने और उनका स्वामित्व ट्रांसफर रोकने का सुझाव भी दिया। इसके अलावा, फिटनेस सर्टिफिकेट और प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र यानी पीयूसी जारी करने या नवीनीकरण पर रोक तथा ड्राइविंग लाइसेंस के नवीनीकरण से जुड़े उपायों पर भी चर्चा हुई।
सड़क पर रैंडम चेकिंग का भी सुझाव
अदालत ने बकाया ई-चालान वाले वाहनों की पहचान के लिए सड़क पर रैंडम चेकिंग करने का सुझाव दिया। यदि जांच के दौरान पता चलता है कि वाहन से जुड़ा ई-चालान लंबे समय से नहीं भरा गया है, तो नियमों के तहत जरूरी कार्रवाई करने और वाहन को जब्त करने जैसे कदमों पर विचार किया जा सकता है। पीठ ने जोर दिया कि केवल कागजों पर आदेश जारी करने के बजाय इन उपायों का जमीन पर प्रभावी तरीके से पालन होना चाहिए।
2012 से चल रही है सड़क सुरक्षा की सुनवाई
यह मामला 2012 में कोयंबटूर के ऑर्थोपेडिक सर्जन एस. राजसीकरन की ओर से दायर जनहित याचिका से जुड़ा है। याचिका में सड़क सुरक्षा, सड़क हादसों को कम करने, बेहतर बुनियादी ढांचे और दुर्घटना के बाद पीड़ितों को उचित सहायता उपलब्ध कराने के लिए समन्वित कदम उठाने की मांग की गई है।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट पिछले कई वर्षों में सड़क सुरक्षा और मोटर वाहन कानून के प्रभावी पालन को लेकर कई निर्देश दे चुका है। अक्तूबर 2025 के एक आदेश में भी अदालत ने सड़क सुरक्षा से जुड़े निर्देशों के पालन की निगरानी जारी रखी थी।