दिल्ली हाईकोर्ट ने भीमा-कोरेगांव हिंसा मामले में घर में ही नजरबंद मानवाधिकार कार्यकर्ता गौतम नवलखा की ट्रांजिट रिमांड की याचिका खारिज कर दी। साथ ही हाईकोर्ट के इस फैसले के साथ ही गौतम की नजरबंदी भी खत्म हो गई।
सोमवार को दिल्ली हाईकोर्ट ने भीमा-कोरेगांव हिंसा में पिछले चार हफ्तों से नजरबंद गौतम नवलखा को नजरबंदी से मुक्त करने की इजाजत दे दी। पुणे पुलिस नवलखा की ट्रांजिट डिमांड की मांग कर रही थी, लेकिन हाईकोर्ट ने उनकी याचिका को खारिज कर दिया।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि नवलखा को 24 घंटे से अधिक समय हिरासत में रखा गया, जिसे उचित नहीं ठहराया जा सकता। गौरतलब है कि नवलखा को दिल्ली में 28 अगस्त को गिरफ्तार किया गया था। दिल्ली हाईकोर्ट का यह आदेश देश की सर्वोच्च अदालत के हाल के 29 सितंबर को दिए फैसले के बाद आया है, जिसमें उन्होंने नवलखा समेत तेलुगू कवि वरवर राव, मानवाधिकार कार्यकर्ता अरूण फरेरा और वेरनन गोंजाल्विस और मजदूर संघ कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज चार सप्ताह के लिए और नजरबंद रखने का आदेश दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि महज असहमति वाले विचारों या राजनीतिक विचारधारा में अंतर को लेकर गिरफ्तार किए जाने का यह मामला नहीं है। कोर्ट ने कहा था कि आरोपियों को उपयुक्त अदालत में कानूनी उपाय का सहारा लेने की आजादी है और उपयुक्त अदालत मामले के गुण दोष पर विचार कर सकती है।
वहीं रिहाई के बाद गौतम नवलखा ने एक स्टेटमेंट जारी करके सुप्रीम कोर्ट के फैसले का आभार जताते हुए अपने वकीलों समेत एलजीबीटी समुदाय, भीम आर्मी के चंद्रशेखर रावण और जेएनयू छात्र संघ का धन्यवाद दिया, जो इस लड़ाई में उनके साथ खड़े थे।
गौरतलब है कि महाराष्ट्र पुलिस ने पिछले साल 31 दिसंबर को हुए एलगार परिषद सम्मेलन के बाद कोरेगांव-भीमा में हिंसा भड़कने के बाद दर्ज प्राथमिकी के सिलसिले में 28 अगस्त को इन कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया था।