केंद्र सरकार ने यौन अपराधों के मामलों में पीड़ितों को जल्द न्याय दिलाने के लिए दो साल पहले गांधी जयंती पर शुरू की गई विशेष त्वरित सुनवाई अदालतों (एफटीएससी) को संचालित करने को लेकर कुछ राज्यों पर नए सिरे से जोर दिया है।
केंद्र सरकार ने 2018 में आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम के पारित होने के बाद 31 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 1,023 एफटीएससी गठित करने का निर्णय लिया था। इनमें से 389 अदालतें विशेष रूप से यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण व पोक्सो अधिनियम के उल्लंघन से संबंधित मामलों से निपटारे के लिए थीं।
दिल्ली, यूपी समेत 17 प्रदेशों में सभी एफटीएससी का संचालन शुरू
न्याय विभाग उन राज्यों से बातचीत कर रहा है जिन्होंने उनके लिए निर्धारित सभी या कुछ एफटीएससी को अभी तक शुरू नहीं किया है। सूत्रों के मुताबिक हाल ही में इन राज्यों को नए पत्र भेजे गए हैं। ऐसे 10 राज्य हैं जिनके द्वारा उन्हें निर्धारित सभी एफटीएससी का संचालन करना बाकी है। कुल प्रस्तावित विशेष त्वरित अदालतों के मुकाबले, 27 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 367 पोक्सो अदालतों सहित 674 ने काम करना शुरू कर दिया।
वहीं, इस साल अगस्त तक इन अदालतों ने लॉकडाउन के बावजूद 56,267 मामलों का निपटारा किया है। सरकार के सूत्रों के मुताबिक 28 राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों ने त्वरित अदालतों के लिए अपनी सहमति दे दी है। लेकिन पश्चिम बंगाल, जहां 123 अदालतें, अंडमान और निकोबार जहां एक और अरुणाचल प्रदेश जहां तीन अदालतें प्रस्तावित हैं, ने अभी तक अपनी सहमति नहीं दी है। गौरतलब है कि आंध्र प्रदेश ने ऐसी 18 में से 9 अदालतों का संचालन शुरू किया है।
बिहार को 54 एफटीएससी निर्धारित की गई थी, लेकिन अब तक 45 अदालतें शुरू की गई हैं। इसी तरह, 138 के कोटे के साथ महाराष्ट्र ने अब तक 33 ऐसी अदालतों का संचालन किया है। उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, तमिलनाडु और नागालैंड सहित 17 राज्य ऐसे हैं जिन्होंने उनके लिए निर्धारित सभी एफटीएससी का कामकाज शुरू कर दिया है।
राज्य को फिलहाल ऐसी अदालत की जरूरत नहीं: अरुणाचल
अरुणाचल प्रदेश ने कानून मंत्रालय में न्याय विभाग को बताया है कि फिलहाल मामलों की संख्या कम होने के कारण राज्य में ऐसी त्वरित अदालतों की आवश्यकता नहीं है। सूत्रों ने बताया कि गोवा के लिए दो त्वरित अदालतें निर्धारित की गई थीं। गोवा ने एक एफटीएससी के लिए सहमति दी है लेकिन इसे अभी तक चालू नहीं किया गया है। दरअसल, इसमें राज्यों की सहमति जरूरी है क्योंकि एफटीएससी केंद्र प्रायोजित योजना का हिस्सा है, जिसमें केंद्र और राज्य दोनों का योगदान होता है।