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गांधी के सेवाग्राम में तीन दिन- क्या संदेश छिपा है सेवा के इस अनूठे केंद्र में 

Sat, 25 Aug 2018 10:46 PM IST
Trainee Trainee राजेश बादल
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सेवाग्राम
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दो दिन सेवाग्राम में बीत चुके हैं। तीसरा दिन अंतिम है। जाने माने पत्रकार और विश्लेषक पी साईंनाथ का संबोधन होगा और औपचारिक धन्यवाद-आभार वगैरह के साथ सिलसिला अगले साल तक के लिए स्थगित हो जाएगा। इस श्रृंखला के दरम्यान कुछ बेहद गंभीर मित्रों की राय थी कि दरअसल वहां चिंतन, मनन और मंथन क्या हुआ- इस पर गहराई से मैंने क्यों नहीं लिखा? 
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मित्रो! वास्तव में जब सोच विचार के लिए आवश्यक शब्द कागज पर उतारे जाते हैं तो कहीं न कहीं क्लिष्ट और कठिन शब्द आ जाते हैं। मेरा मानना है कि फिर श्रृंखला यात्रा वृतांत न होकर उबाऊ वैचारिक जुगाली होकर रह जाती है। इस एक्सचेंज ऑफ थॉट के लिए तो आपसी विमर्श ही श्रेष्ठ माध्यम है। मेरा निवेदन है कि इसके लिए हम सबको ऐसे आयोजनों में अपनी रोजमर्रा की जिंदगी से कुछ समय चुराकर शिरकत करनी चाहिए। 

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बहरहाल! अभी तो मैं आपको बापू के आश्रम की एक झलक दिखाना चाहता हूं। सेवाग्राम में गांधीजी और उनकी धर्मपत्नी कस्तूरबा की कुटियाएं हैं। वहां उनके स्मृति चिह्न सुरक्षित हैं। मसलन उनका टाइपराइटर और टेलीफोन भी है। यह टेलीफोन गांधीजी के लिए जरूरी नहीं था। वाइसराय ने उन्हें हॉटलाइन का प्रस्ताव दिया था। गांधीजी ने मना कर दिया तो वाइसराय ने कहा कि आपसे संवाद मेरे लिए भी आवश्यक है और भारत के हित में भी। इसके बाद बापू ने अनुमति दे दी। हॉटलाइन डाली गई। यही टेलीफोन आज भी रखा है।



गांधीजी अपना वजन नियमित लेते थे। वह मशीन भी है। बताया गया कि एक बार वाइसराय आए तो रात्रि विश्राम सेवाग्राम में ही किया। बापू जिस ढंग से देसी बिस्तर पर सोते थे, वैसे ही वाइसराय को बाहर खुले में सुलाया गया। उन दिनों सेवाग्राम में सांप बहुत निकलते थे। बापू ने उनको पकड़ने के लिए पिंजरा बनवाया। बापू के सहयोगी जहरीले नाग पकड़ते थे और जंगल में छोड़ देते थे।

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बापू के लिए उनके एक सहयोगी ने छोटा चरखा बनाया था, जिससे भारत का हर परिवार अपनी जरूरत के हिसाब से कपड़ा बना सके। इन सहयोगी का नाम था-अंबर। इसलिए महात्मा गांधी ने उसका नाम अंबर चरखा रख दिया। मैंने भी कुछ देर यह चरखा चलाया। यहां एक केंद्र ऐसा भी है, जहां ए टू जेड यानि कपास से कपड़ा बनाने की यात्रा बताई जाती है। वहां से आप बेहतरीन खादी न्यूनतम दरों पर खरीद सकते हैं।



आश्रम के अन्य प्रॉडक्ट भी आप गारंटी के साथ क्रय कर सकते हैं। उदाहरण के तौर पर यहीं उगाई गई हल्दी, मिर्च और मसाले, शुद्ध शहद, दालें, चावल, तथा उपहार में देने लायक अनेक वस्तुएं। देसी घी एकदम शुद्ध 700 रुपए किलो में मिल जाएगा। एक बूंद जीभ पर रखिए। स्वाद मिलते ही आप उछल पड़ेंगे। और हाथ से बिलोकर बनाया मट्ठा तो अदभुत है। मैंने तो एक बार में तीन चार गिलास से कम नहीं पिया। सिर्फ 5 रुपए में एक गिलास। यहां मैंने चित्रों के मार्फत कुछ बताने का प्रयास किया है।



आप एक बार परिवार के साथ जरूर आइए। बच्चों को कुछ संस्कार जो आप बोलकर नहीं दे पाते, वह सेवाग्राम अपने आप उन्हें दे देगा। कुछ किताबें तथा अन्य साहित्य अपने घर में रामचरित मानस की तरह पढ़ना और रखना ही चाहिए। यहां बापू ने जिस नई तालीम पर जोर दिया, आज भी स्कूल चलते देख सकते हैं। भारत का पहला ग्रामीण मेडिकल कॉलेज यहां खुला था। एकदम नई अवधारणा के साथ। 



आज इतना ही। कल समापन किश्त में पी साईंनाथ का संबोधन और थोड़ा सा कुछ और। (कल अंतिम कड़ी) 
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