पूर्व अधिकारियों का कहना है, 31 साल पुराने रूबिया सईद अपहरण केस के दौरान एक खुलासा हुआ था। उस वक्त आतंकवाद का दौर चरम पर था। रूबिया सईद, देश के तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी थीं। फारूक अब्दुल्ला तब जम्मू-कश्मीर के वजीर-ए-आला यानी मुख्यमंत्री थे। उस वक्त भी आतंकियों के सामने कोई मकसद नहीं था, वे केवल गुमराह होकर हमले कर रहे थे। कुछ आतंकी ऐसे थे, जिन्हें सीधे तौर पर सीमा पार से आदेश मिलते थे। पकड़े गए आतंकियों ने एक खुलासा किया था। वे कहते थे कि हमें कहा गया, तुम बस मारो, हमला करो। इस मसले पर जब एक वजीर-ए-आला से बात हुई, तो उन्होंने अपनी 'फिरन' यानी कश्मीरी पारंपरिक पोशाक, में नमक रखा हुआ था। बोले, 'पड़ोसी' मतलब पाकिस्तान का नमक है। इसका अर्थ था कि वे खुद को पाकिस्तान के प्रति वफादार दिखाने का प्रयास करते थे। आजादी के इतने साल बाद भी वे जम्मू-कश्मीर को भारत का हिस्सा नहीं मानते थे। इससे अंदाजा लगा सकते हैं कि कश्मीर में अब तक आतंकवाद पूरी तरह खत्म क्यों नहीं हो सका है।
1989-90 में तो हजारों आतंकी मौजूद थे, तो भी उनका खात्मा किया गया। किसी मुख्यमंत्री के पास मौजूद 'नमक' उन्हें बचा नहीं सका। पूर्व आईजी कमलकांत शर्मा बताते हैं, हमारे सुरक्षा बल हर मामले में सक्षम हैं। उन्हें तो बस 'यस' शब्द का इंतजार रहता है। जब उन्हें इसकी इजाजत मिल जाती तो वे पीछे मुड़कर नहीं देखते। आतंकियों का सफाया करने के बाद ही वापस लौटते थे। आज तो स्थिति और अधिक बेहतर हो गई है। 'यस' शब्द का मतलब, हम बिल्कुल नहीं होने देंगे। कश्मीर में लोगों को अपने इतिहास से नहीं जुड़ने दिया जा रहा। श्रीनगर का म्यूजियम खाली पड़ा रहता है। वहां सभी धर्मों का इतिहास पढ़ने को मिल जाता है। वे कश्मीरी इस्लाम के बारे में ज्यादा नहीं जानते। हालांकि वह बहुत बेहतर है, लेकिन उन्हें गुमराह कर दूसरी तरफ मोड़ दिया गया है।
पड़ोसी मुल्क और उसके गुर्गे, स्थानीय मुस्लिमों को बरगलाने का प्रयास करते हैं। अब वहां पर विकास तेजी से हो रहा है। युवाओं के पास विकास की मुख्य में शामिल होने के अलावा दूसरा विकल्प नहीं है। आतंक का रास्ता बहुत छोटा हो गया है। अनुच्छेद 370 खत्म होने के बाद पत्थरबाजी लगभग खत्म हो चली है। सुरक्षा एजेंसियों को यह भी मालूम है कि घाटी में कितने युवा गायब हैं। सरेंडर पॉलिसी बनाई गई है। ऐसे में अगर तालिबान के दम पर पाकिस्तान उछलता है तो वह उसकी गलतफहमी है। घाटी में अब आतंकवाद का दौर अपनी अंतिम अवस्था में है।