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Supreme Court: गैंगस्टर रामनारायण के फर्जी मुठभेड़ मामले में पूर्व पुलिस अफसर प्रदीप शर्मा को राहत, मिली जमानत

Sat, 11 May 2024 09:19 PM IST
मिथिलेश नौटियाल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Supreme Court: शीर्ष अदालत ने गैंगस्टर रामनारायण गुप्ता के 2006 के फर्जी मुठभेड़ मामले में मुंबई के पूर्व पुलिस अधिकारी प्रदीप शर्मा को राहत दी है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी वकील की दलील सुनने के बाद शर्मा को जमानत दी है। 

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सुप्रीम कोर्ट (फाइल) - फोटो : एएनआई
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विस्तार
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सर्वोच्च न्यायालय ने गैंगस्टर रामनारायण गुप्ता उर्फ लखन भैया के 2006 के फर्जी मुठभेड़ मामले में मुंबई के पूर्व पुलिस अधिकारी प्रदीप शर्मा को राहत दी है। अदालत ने उम्रकैद की सजा पा चुके पूर्व पुलिस अधिकारी को जमानत दी है। न्यायमूर्ति ऋषिकेश रॉय और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने इस मामले पर सुनवाई की। अदालत में महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश वकील ने बताया कि शर्मा को जमानत देने पर सरकार को कोई आपत्ति नहीं है। इस दलील पर गौर करते हुए शीर्ष अदालत ने मुंबई पुलिस के पूर्व अधिकारी को जमानत दे दी।  

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शर्मा ने बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर की थी अपील
शीर्ष अदालत में पूर्व पुलिस अधिकारी प्रदीप शर्मा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी और सिद्धार्थ लूथरा शर्मा पेश हुए। उधर, शिकायतकर्ता की और से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता आर बसंत ने प्रदीप शर्मा की जमानत याचिका का विरोध किया। प्रदीप शर्मा ने इससे पहले 19 मार्च को बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ शीर्ष अदालत में अपील दायर की थी, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया था। इससे बाद आठ अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आजीवन कारावास की सजा भुगतने के लिए अगले आदेश तक शर्मा को आत्मसमर्पण करने की जरूरत नहीं है।

मुंबई के वर्सोवा इलाके में हुई थी फर्जी मुठभेड़
11 नवंबर 2006 को पुलिस की एक टीम ने नवी मुंबई के वाशी इलाके से रामनारायण गुप्ता उर्फ लखन भैया और उनके दोस्त अनिल भेड़ा को हिरासत में लिया था। उसी दिन रामनारायण गुप्ता को पश्चिमी मुंबई के वर्सोवा के पास एक फर्जी मुठभेड़ में मारा गया था। इसके बाद मामले की सुनवाई सत्र न्यायालय में हुई थी। 2013 में सत्र अदालत ने 21 आरोपियों को दोषी पाया और उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। इस दौरान सबूतों के अभाव में शर्मा को बरी कर दिया था। इसके बाद सत्र न्यायालय के आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी और अदालत ने सत्र न्यायालय द्वारा पारित फैसले को रद्द कर दिया था। 

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