अदालत ने कहा, निजता के अधिकार का उल्लंघन नहीं किया जा सकता है। दुर्भाग्य से, नीचे की दोनों अदालतों द्वारा अपनाए गए दृष्टिकोण और अपनाई गई भाषा अपीलकर्ता के इस तरह के अधिकार को बर्बाद कर देती है। यह स्पष्ट है कि महिला पर बिना किसी ठोस आधार के दोष लगाया गया है। शीर्ष अदालत ने कहा, महिला और तालाब में पाए गए मृत बच्चे के बीच किसी भी प्रकार का कोई संबंध स्थापित नहीं किया जा सका है।
उच्चतम न्यायालय ने कहा, निष्कर्ष केवल इस आधार पर निकाला गया है कि दोषी-अपीलकर्ता एक महिला थी जो अकेली रह रही थी और गर्भवती थी (जैसा कि सीआरपीसी की धारा 313 के तहत बयान में स्वीकार किया गया है)। अदालत ने आगे कहा कि बच्चा पैदा करना है या न करना या गर्भपात कराना, यह फैसला करना पूरी तरह से महिला की निजता के दायरे में है।
शीर्ष अदालत ने कहा, यह रिकॉर्ड का विषय है कि किसी भी गवाह ने दोषी-अपीलकर्ता को मृतक बच्चे को गढ्ढे में फेंकते नहीं देखा है। जैसा कि अब तक देखा गया है कि अभियोजन पक्ष द्वारा किसी भी प्रकृति का कोई निर्णायक सबूत पेश नहीं किया है और दोषी के बयान पर संदेह करने के लिए कोई सबूत नहीं है।