सामाजिक कार्यकर्ता डॉक्टर नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के मामले में अदालत ने फैसला सुना दिया है। पुणे की एक अदालत ने दाभोलकर की हत्या के मामले में दो आरोपियों को दोषी ठहराया और तीन को बरी कर दिया। दाभोलकर महाराष्ट्र में अंधविश्वास के खिलाफ आंदोलन चलाने के लिए जाने जाते थे। 2013 में नरेंद्र दाभोलकर की हत्या कर दी गई थी। मई 2014 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने दाभोलकर हत्या मामले को सीबीआई को सौंपने का आदेश दिया था।
सनातन संस्था ने किया फैसले का स्वागत
नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के मामले में अदालत के फैसले के बाद सनातन संस्था ने कहा है कि वह डॉ. दाभोलकर हत्या प्रकरण में न्यायालय के निर्णय का आदर करती है। पुणे में सीबीआई की विशेष न्यायालय ने सनातन संस्था के विक्रम भावे, हिन्दू जनजागृति समिति के डॉ. वीरेंद्रसिंह तावडे और हिन्दू विधीज्ञ परिषद के वकील संजीव पुनालेकर को निर्दाेष मुक्त किया। इन सभी पर लगाया गया यूएपीए कानून भी निरस्त किया है। सनातन संस्था का कहना है कि इस प्रकरण मे दोषी साबित किए गए सचिन अंदुरे और शरद कालस्कर संस्था के पदाधिकारी नहीं। हालांकि, संस्था ने संभावना जताई कि अंदुरे और कालस्कर को भी इस प्रकरण में फंसाया गया है। साथ ही कहा ‘हमें विश्वास है कि मुंबई उच्च न्यायालय में सचिन अंदुरे और शरद कालस्कर निर्दोष मुक्त होंगे।’
‘11 वर्षों के बाद मिला न्याय’
संस्था ने प्रेस विज्ञप्ति में लिखा है कि ‘सनातन संस्था के विनय पवार और सारंग अकोलकर को हत्यारा कहा गया, परंतु जिनसे पिस्तौल मिली थी, उन मनीष नागोरी और विकास खंडेलवाल को क्लीन चिट दी गई। उसके बाद भूमिका बांधी गई कि सचिन अंदुरे और शरद कालस्कर ने हत्या की है।’ संस्था ने कहा कि बीते 11 वर्षाें में सनातन के 1600 साधकों की जांच की गई और आश्रमों पर छापे मारे गए। आज 11 वर्षाें के उपरांत विलंब से ही सही परंतु सनातन संस्था को न्याय प्राप्त हुआ है ।