विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने शनिवार को वैश्विक दक्षिण के देशों के साथ भारत के संबंधों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि ये देश किस तरह से अपने विकास के लिए अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की मदद लेते हैं। जयशंकर ने तीन उदाहरण देते हुए बताया कि भारत ने किस तरह से इन देशों से समर्थन और भरोसा हासिल किया है।
'वैश्विक दक्षिण के कई देशों को भारत से मिला पहला कोविड टीका'
पुणे में एक कार्यक्रम में भाग लेते हुए जयशंकर ने कहा, वैश्विक दक्षिण का मतलब क्या है? इसका मतलब उन देशों से है जो कभी उपनिवेश रहे हैं, जिन्होंने अपनी स्वतंत्रता हासिल की है या जो अभी विकासशील हैं। ये ज्यादातर निम्न आय वाले देश हैं। इन देशों का भारत पर उच्च स्तर का भरोसा व उम्मीद है और इसके कारण भी हैं। मैं आपको तीन उदाहरण दे सकता हूं। पहला, वैश्विक दक्षिण के लोगों को याद है कि कोविड-19 के दौरान जब विकसित देश टीकों का भंडारण कर रहे थे, तब कई देशों ने अपना पहला टीका भारत से लिया। भारत ने अपने लोगों को टीका लगाने के साथ-साथ दूसरे देशों को भी मदद की, जिसका वैश्विक स्तर पर गहरा भावनात्मक असर पड़ा।
आज भारत के पास एक आत्मविश्वास है: जयशंकर
उन्होंने आगे कहा, दूसरा उदाहरण यूक्रेन का है और तीसरा जी-20 बैठक का है। अफ्रीकी संघ कई वर्षों से जी-20 में एक सीट चाहता था। हर बैठक के पहले दिन अफ्रीकी संघ से कहा जाता था कि चिंता मत करो, इस बैठक में हम आपके बारे में सोचेंगे लेकिन अंतिम कुछ नहीं होता था। अफ्रीकी देशों का मानना है कि भारत में संवेदना है, भारत की प्रतिष्ठा है और आज भारत के पास एक आत्मविश्वास है।
चीन के साथ एलएसी पर गश्त को लेकर समझौते पर क्या कहा
विदेश मंत्री ने चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर गश्त के लिए हुए समझौते को सैन्य बल और प्रभावी कूटनीति का नतीजा बताया। उन्होंने कहा कि यह समझौता ऐसी परिस्थितियों में संभव जो जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती थी। पुणे में छात्रों से बातचीत के दौरान जयशंकर ने कहा कि भारत-चीन के बीच रिश्तों को सामान्य होने में अभी भी समय लगेगा, क्योंकि भरोसे और सहयोग की भावना होनी जरूरी है।
उन्होंने बताया कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस में ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की थी, तब यह तय किया गया था कि दोनों देशों के विदेश मंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मिलकर आगे की दिशा पर चर्चा करेंगे। जयशंकर ने कहा, अगर आज हम इस स्थिति में पहुंचे हैं, तो इसका एक कारण है कि हमने अपनी स्थिति पर डटे रहने और अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट करने के लिए ठोस प्रयास किए। हमारी सेना एलएसी पर अत्यधिक कठिन परिस्थियों में देश की रक्षा कर रही थी और उन्होंने अपना दायित्व निभाया, जबकि कूटनीति ने भी अपनी भूमिका निभाई।
'पहले सीमा पर बुनियादी ढांचे को किया गया था नजरअंदाज'
उन्होंने बताया कि पिछले एक दशक में भारत ने अपनी सीमा पर बुनियादी ढांचे में सुधार किया है। उन्होंने कहा, पहले के वर्षों में सीमा पर बुनियादी ढांचे को वास्तव में नजरअंदाज किया गया था। आज हम हर साल पांच गुना अधिक संसाधन लगा रहे हैं, जिसके परिणाम दिख रहे हैं और इससे सेना प्रभावी रूप से तैनात होने में सक्षम हो पा रही है।
संबंधित वीडियो-