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सियासत: बिहार में फिर चलेगा क्या लालू का जादू, भाजपा-जदयू कैसे पाएंगे पार?

Mon, 05 Jul 2021 04:05 PM IST
सुरेंद्र जोशी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पटना

सार

राजद के 25 वें स्थापना दिवस पर लालू प्रसाद यादव फिर पूरे बिहार में छाए रहे। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या उनका जादू फिर चलेगा।
 
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लालू प्रसाद यादव
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विस्तार
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जेल और बीमारी की 'हथकड़ियां' तोड़कर लालू प्रसाद यादव तीन साल बाद एक बार फिर बिहार की राजनीति में सक्रिय दिखे। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के 25वें स्थापना दिवस पर उन्होंने अपने अंदाज में कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ाया। यह भी अहम रहा कि विधानसभा चुनाव के दौरान पोस्टरों से लापता रहे लालू पार्टी के स्थापना दिवस पर राज्य की हर गली और दीवार पर छाए रहे।

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अब सवाल यह उठता है कि बिहार में जदयू के मुकाबले भाजपा का कद जिस तरह बढ़ा, उसमें लालू किस तरह सेंध लगा पाएंगे? क्या वह अपनी '15 साल पुरानी छवि' को बदलने की कोशिश करते हुए राज्य की राजनीति के सबसे अहम मोहरे साबित होंगे या तेजस्वी को विरासत सौंपकर खुद मेंटॉर की भूमिका निभाएंगे?

फिर गरीबों पर लालू का फोकस
गौरतलब है कि बिहार की राजनीति में लालू का दबदबा इस वजह से बढ़ा, क्योंकि उन्होंने हमेशा गरीबों के उत्थान की बात की। जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने मीडिया को पहला इंटरव्यू दिया तो उसमें भी गरीब-गुरबों का जिक्र किया। यानी यह तय है कि बिहार की सियासत में लालू अगर तख्तापलट की कोशिश करेंगे तो राज्य के गरीब ही उनकी नैया के खेवनहार बन सकते हैं। नेता के कभी रिटायर न होने की बात कहते हुए उन्होंने एनडीए पर सीधा निशाना साधा। साथ ही, नीतीश से दोबारा हाथ मिलाने से भी साफ इनकार कर दिया। ऐसे में माना जा रहा है कि राजद अब अपने दम पर ही बिहार की राजनीति में खुद को संवारने की कोशिश करेगी। अगर वह गठबंधन करती भी है तो उसमें नीतीश का साथ कतई नहीं होगा। 

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लालू या तेजस्वी, राजद का चेहरा कौन?

लालू की वापसी के बाद राजद के सामने लालू और तेजस्वी में से किसी एक को चुनने की जद्दोजहद भी हो सकती है। दरअसल, राज्य में 2020 का विधानसभा चुनाव राजद ने पूरी तरह तेजस्वी के चेहरे पर लड़ा। राजद भले ही जीत हासिल नहीं कर सकी, लेकिन सबसे बड़ी पार्टी जरूर बनकर उभरी। 

उधर, लालू के राजनीतिक करियर पर गौर करें तो चारा घोटाले में फंसने के बाद उनके नेतृत्व में पार्टी की सफलता का ग्राफ ढलान की ओर बढ़ता रहा। 2021 में लालू की मौजूदगी से कार्यकर्ताओं का उत्साह तो बढ़ता नजर आ रहा है, लेकिन 2025 में स्थिति कैसी होगी, उस पर अभी संशय बरकरार है, क्योंकि चुनाव से पहले लालू या तेजस्वी में से किसी एक को चुनना पार्टी की मजबूरी होगी। 



लालू की वापसी के राजनीतिक मायने
आमतौर पर नेताओं के जेल में सजा काटने से राजनीति में नेताओं का कद घट जाता है तो क्या लालू के साथ भी ऐसा ही होने वाला है? जानकार मानते हैं कि लालू यादव के साथ ऐसा नहीं होगा, क्योंकि वह जमीनी नेता और फाइटर हैं। साथ ही, वह अपनी पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा हैं। 

तेजस्वी के नेतृत्व में पार्टी ने भले ही दमदार प्रदर्शन किया, लेकिन नीतीश को बराबरी की टक्कर देने वाले और अकेले उन्हें घेरने का कुव्वत रखने वाले एकमात्र नेता लालू यादव ही हैं, क्योंकि दोनों ही सामाजिक न्याय के एक ही कक्षा से पढ़कर निकले हैं। माना जा रहा है कि लालू यादव के अब बिहार की राजनीति में फिर से खड़े होने से न केवल उनके कार्यकर्ताओं और नेताओं में जोश आएगा, बल्कि वह पिछड़े, अति पिछड़े नेताओं को फिर से गोलबंदी  की कोशिश करेंगे। 

नीतीश के कई मंत्री अफसरशाही के रवैए से नाराज होकर अब खुलेआम बयानबाजी करने लगे हैं। ऐसे में सियासी पटखनी देने के लिए मशहूर माने जाने वाले लालू इन नेताओं के कंधे पर अपना हाथ रख सकते हैं। ओबीसी में राजद की पकड़ फिर से बढ़ने की संभावना जताई जा रही है, जिसे बीजेपी धीरे-धीरे अपने कब्जे में लेने की कोशिश कर रही है। 
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लालू से बढ़ेगी पार्टी की एकता

माना जा रहा है कि लालू की सीमित सक्रियता के बावजूद पार्टी में एकता बढ़ेगी। उनके चुनाव और राजनीति में सक्रिय नहीं रहने से राजद के कई नेता जदयू या भाजपा में शामिल हो गए। यह दावा तक किया गया कि जिस तरह की टूट लोजपा में हुई, उसी तरफ राजद में भी बिखराव दिख सकता है, क्योंकि पार्टी के कई वरिष्ठ नेता तेजस्वी यादव की कार्यशैली से नाराज है। माना जा रहा है कि लालू के आने से पार्टी की अंदरूनी कलह पर भी रोक लगने सकती है। 

बिहार में बढ़ी राजनीतिक हलचल
बिहार में भले ही चुनावी माहौल नहीं है, लेकिन लालू के आने से राजनीतिक हलचल बढ़ गई है। यही वजह है कि लालू के जेल से बाहर निकलते ही भाजपा नेताओं ने उन्हें निशाने पर लेना शुरू कर दिया। ऐसे में यह तो तय माना जा रहा है कि आने वाले चुनावों में लालू के नाम पर राजद को सहानुभूति के वोट हासिल हो सकते हैं। जानकार यह भी कहते हैं कि लालू की तबीयत दुरुस्त रहती है तो 2024 के लोकसभा चुनाव में वह यूपीए की ताकत बढ़ाने में भी अहम किरदार साबित हो सकते हैं।
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