'बोल कि लब आजाद हैं तेरे, बोल जबां अब तक तेरी है।' फैज अहमद की प्रसिद्ध नज्म की यह पहली पंक्ति लोगों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बखूबी बयां करती है। भारतीय संविधान निर्माताओं ने बोलने-लिखने की आजादी की अहमियत समझते हुए 72 साल पहले हरेक नागरिक को अनुच्छेद-19 (1) में यह मौलिक अधिकार सौंपा। लेकिन आजकल अभिव्यक्ति का सबसे बड़ा माध्यम बने सोशल मीडिया के दौर में हमारी आजादी संविधान से निकलकर चंद टेक कंपनियों पर ज्यादा निर्भर होती जा रही।
बोल कि लब आजाद हैं, पर भारत की संप्रभुता से ऊपर नहीं डिजिटल अभिव्यक्ति की दोधारी तलवार
इनके अरबपति सीईओ लोगों के संविधानिक अधिकार को अप्रत्यक्ष रूप से नियंत्रित करने में जुटे हैं। पिछले कुछ वर्षों में लगातार हो रहे नेता उल्लंघन और अभिव्यक्ति पर पक्षपात ने सोशल मीडिया कंपनियों की पोल खोल दी है। यह प्लेटफार्म उन दोनों बेशकीमती अधिकारों का हनन कर रहे हैं जो संविधान से हमें मिले हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में अनियंत्रित होने जा रहे सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर लगाम की सख्त दरकार है।
भारत में 40 करोड़ लोग इसके जरिए संवाद कर रहे हैं
आधी दुनिया इस वक्त सोशल मीडिया पर है और अकेले भारत में 40 करोड़ लोग इसके जरिए संवाद कर रहे हैं। इन तमाम यूजर्स को सोशल मीडिया कंपनियों से जुड़ने और उनके कंटेंट की निगरानी की शर्तें-नियम मानने होते हैं। यही स्थिति यहां तक तो ठीक है लेकिन इन नियमों के जरिए यह प्लेटफार्म किसी संप्रभु देश के संविधान और कानून की अवहेलना हरगिज नहीं कर सकते। इसके बावजूद इन पर क्या-क्या कैसे कहा जाएं।
इनकी नीति में राजनीतिक और सामाजिक पूर्वाग्रह खुलकर उजागर होते हैं। ऐसे में उस सवाल है कि क्या भारतीय नागरिकों की ऑनलाइन अभिव्यक्ति ट्विटर, फेसबुक तय करेंगे जबकि संविधान में अधिकार सीधे हमें सौंपा है। कानूनविद कहते हैं कि फेसबुक ट्विटर या गूगल जब कारोबारी कामकाज में भारतीय कानूनों की पालना करती हैं तो फिर यहां के नागरिकों की अभिव्यक्ति और निजता के सम्मान के लिए ऐसा क्यों नहीं करती।
मनमानी सहने के अलावा और कोई विकल्प नहीं
मौजूदा व्यवस्था में यह तक साफ नहीं है कि ट्विटर-फेसबुक की कार्रवाई के खिलाफ हम और आप कहां अपील करेंगे। यूजर्स की शिकायतों की सुनवाई और उनके समाधान की व्यवस्था के बिना भारतीय सोशल मीडिया यूजर्स ट्विटर, फेसबुक की मनमानी के अधीन ही रहेंगे।
लिहाजा जरूरी है कि इन कंपनियों को उनकी कार्यशैली और फैसलों के लिए उत्तरदायी बनाना चाहिए। साथ ही इन्हें पूरी तरह उस देश के कानून की पकड़ में रखना चाहिए जहां से ये संचालित हो रही हैं।