गुरुवार को सर्वे रिपोर्ट जारी करते समय केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त स्वास्थ्य सचिव लव अग्रवाल ने कहा कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में नवोन्मेष से मरीजों की सुरक्षा मजबूत होगी। स्वास्थ्य उद्योग को और अधिक कुशल बनने के लिए प्रेरित करना बहुत जरूरी है।
डॉक्टर की सलाह के बाद 10 में आठ मरीजों ने निजी अस्पतालों में सर्जरी कराई, जबकि इन मरीजों की आय छह लाख रुपये सालाना से कम थी। यह जानकारी द इंटरनेट व मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (आईएएमएआई) की सर्वे रिपोर्ट में सामने आई है, जिसमें बताया गया कि देश के मरीजों में चिकित्सा सेवा के लिए सरकारी अस्पतालों पर भरोसा कम हो रहा है।
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गुरुवार को सर्वे रिपोर्ट जारी करते समय केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त स्वास्थ्य सचिव लव अग्रवाल ने कहा कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में नवोन्मेष से मरीजों की सुरक्षा मजबूत होगी। स्वास्थ्य उद्योग को और अधिक कुशल बनने के लिए प्रेरित करना बहुत जरूरी है।
आईआईटी जोधपुर के अध्ययन में यह आया था सामने : सर्जिकल शीर्षक वाली इस सर्वे रिपोर्ट से पहले आईआईटी जोधपुर का भी एक अध्ययन सामने आया था, जिसे बायो मेड सेंट्रल मेडिकल जर्नल में प्रकाशित किया गया। उसमें बताया गया कि प्राइवेट अस्पताल में एक मरीज भर्ती करने पर सरकार या फिर रोगी के परिवार को तीन गुना तक अधिक खर्च करना पड़ रहा है, जबकि सरकारी अस्पताल में वही उपचार काफी सस्ता है।
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2019 से 2022 के बीच दो करोड़ ऑपरेशन
रिपोर्ट में बताया कि साल 2019 से 2022 के बीच देश के सरकारी और निजी अस्पतालों में अनुमानित तौर पर दो करोड़ ऑपरेशन हुए हैं। छह महानगर दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, बंगलूरू, कोलकाता और अहमदाबाद के अस्पतालों में भर्ती मरीजों पर जब सर्वे किया गया तो पता चला कि दो में से 1.60 करोड़ (80%) मरीजों ने ऑपरेशन के लिए सरकारी की जगह निजी अस्पताल को चुना।
इस तरह तैयार की रिपोर्ट : सर्वे में कुल 280 मरीजों टीमों ने जब बातचीत की तो 196 (72%) मरीजों ने बताया कि उन्होंने निजी अस्पतालों में इलेक्टिव यानी वैकल्पिक सर्जरी कराई हैं। इस बीच 50 फीसदी मरीजों से जब उनकी आमदनी के बारे में पूछा गया तो उन्होंने पूरे परिवार की वार्षिक आय छह लाख रुपये से कम होना स्वीकार किया। केवल 22 फीसदी के पास स्वास्थ्य बीमा था।