'सोसियो-इकोनॉमिक इंपैक्ट असेसमेंट ऑफ फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म' के नाम से जारी इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि छोटी शिफ्ट में काम करने वाले कर्मचारियों की कमाई में भी कमी आई है। लगभग पांच घंटे काम करने वाले कर्मचारियों की कमाई 7,999 रुपये से कम होकर 7157 रुपये रह गई है। यह रिपोर्ट देश के 28 छोटे, मंझोले और बड़े शहरों के 924 फूड डिलीवरी ब्वॉय पर किए गए अध्ययन पर आधारित है।
पढ़े-लिखे लोग भी कर रहे ये काम
सामान्य तौर से लोग यह मानते हैं कि फूड डिलीवरी का काम कम पढ़े लिखे या अनपढ़ लोग ही करते हैं। लेकिन एनसीएईआर का दावा है कि काफी पढ़े-लिखे लोग भी यह काम कर रहे हैं। यदि इसी तरह के दूसरे कामों से तुलना करें तो फूड डिलीवरी का काम करने वाले मार्केट में ज्यादा पढ़े लिखे युवा काम कर रहे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है कि इस सेक्टर में काम करने के लिए बड़ी औपचारिकता की आवश्यकता नहीं होती।
कई बार जिन पढ़े लिखे लोगों की अचानक नौकरी चली जाती है, वे भी नई नौकरी पाने तक अपने आवश्यक खर्च चलाने के लिए इस सेक्टर में अस्थाई तौर पर आ जाते हैं। इस कारण भी इस सेक्टर में अपेक्षाकृत पढ़े लिखे युवा आ जाते हैं।
ज्यादा काम, कमाई कम
एक फूड डिलीवरी कंपनी के लिए काम कर रहे सचिन गुप्ता ने अमर उजाला को बताया कि कमाई की तुलना में उन्हें ज्यादा काम करना पड़ता है। किसी कंपनी में काम करने वाला एक सामान्य कर्मचारी आठ घंटे की ड्यूटी करता है। इसके बाद वह अपने परिवार को समय दे सकता है या अपना कोई काम कर सकता है। लेकिन फूड डिलीवरी का काम करने वालों के लिए समय की कोई सीमा नहीं है।
कुछ लोग किसी कंपनी में अपनी ड्यूटी करने के बाद अतिरिक्त कमाई के लिए फूड डिलीवरी का काम करते हैं। लेकिन जो लोग स्थाई तौर पर यही काम करते हैं, उनके काम करने के समय की कोई बाध्यता नहीं होती। लेकिन काम भर का पैसा कमाने के लिए उन्हें 12 से 14 घंटे तक काम करना पड़ता है। लेकिन इस कड़ी मेहनत के बाद भी उन्हें 20 हजार रुपये तक की कमाई करना भी मुश्किल पड़ जाता है।
डिलीवरी के हिसाब से पैसे, लेकिन पेट्रोल-वाहन का मेंटेनेंस नहीं
फूड डिलीवरी का काम करने वाली कंपनियां ज्यादातर अनियमित लोगों से डिलीवरी का काम लेती हैं। क्षमता के अनुसार कुछ स्थानों पर स्थाई कर्मचारी भी रखे जाते हैं, जबकि ज्यादातर कर्मचारी प्रति डिलीवरी के अनुसार पैसा पाते हैं। यह पैसा 60 रुपये से 120 रुपये तक होता है। लेकिन पेट्रोल और गाड़ी का मेंटेनेंस उन्हें स्वयं देना पड़ता है। ऐसे में यदि उन्हें हर महीने 20 हजार रुपये तक की कमाई हो भी जाती है तो सभी खर्च काटकर उनके पास 15 हजार रुपये से भी कम आता है जो एक दिहाड़ी श्रमिक की कमाई के आसपास होता है।