अपनी सुपरिचित शैली में एक बार फिर लोगों को चौंकाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बड़ा निर्णय लिया और तीनों विवादित कृषि कानूनों के वापसी की घोषण कर दी। लेकिन कहा जा रहा है कि इस बड़े फैसले के समय भी केंद्र ने वही गलती दोहराई जो इन कानूनों को लाने के समय की गई थी। विवादित कृषि कानूनों को लाने के समय भी केंद्र सरकार ने संबंधित पक्षों से बातचीत करने और उनकी राय लेने की कोई कोशिश नहीं की थी, और आज कानूनों को खत्म करने का एलान करते समय भी केंद्र ने किसी से कोई बातचीत नहीं की। इसे केंद्र की राजनैतिक शैली की बड़ी खामी के तौर पर देखा जा रहा है।
प्रधानमंत्री की कानूनों को खत्म करने की घोषणा के बाद भी आंदोलन की समाप्ति पर असमंजस बरकरार है। किसान नेता अब न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सरकार को झुकाने की तैयारी कर रहे हैं। राकेश टिकैत, अविक साहा जैसे किसान नेताओं ने कह दिया है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सहमति के बिना आंदोलन को समाप्त करने पर कोई निर्णय नहीं किया जाएगा। यह ऐसी स्थिति बन रही है कि जिसमें कृषि कानूनों के समाप्त होने के बाद भी सरकार के गले की फांस बरकरार रहने वाली है। यानी कृषि कानून खत्म होने के बाद भी वह संकट टला नहीं है, जिसे टालने के लिए सरकार ने इतना बड़ा फैसला लिया है।
न्यूनतम समर्थन मूल्य के मुद्दे पर सरकार दोहरे दबाव में होगी। यदि वह किसानों की मांग के अनुरूप सभी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य पर पूरी फसल की खरीद के लिए तैयार होती है, तो इसके लिए भारी मात्रा में धन की आवश्यकता होगी जो फिलहाल सरकार के पास नहीं है। यदि फसलों के उत्पादन मूल्य को घटाने के लिए बिजली-पानी मुफ्त देने की घोषणा की जाती है तो भी सरकार पर दबाव बढ़ेगा।
खुले बाजार में भी फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करने पर बाजार में खाद्यान्न के भाव आसमान छूने की संभावना है। इसके कारण महंगाई बढ़ेगी और आम आदमी को भारी कीमत चुकाकर अनाज खरीदना पड़ेगा। इससे भी आम आदमी की सरकार से नाराजगी बढ़ सकती है।
किसान नेता डॉ. आशीष मित्तल ने अमर उजाला से कहा कि ये तीनों कृषि कानून देश के 14 करोड़ किसान परिवारों और लगभग 70 फीसदी आबादी की जिंदगी पर सीधा असर डालने वाले थे। इतना बड़ा निर्णय लेने के पहले प्रधानमंत्री को लोगों से बातचीत कर इस मसले पर उनकी राय जानने-समझने की कोशिश करनी चाहिए थी। लेकिन केंद्र सरकार ने किसानों और कृषि वैज्ञानिकों से बातचीत के बिना यह कानून लाने की गलती की। उन्होंने कहा कि यदि कानून लाने के पहले सरकार ने बातचीत की होती तो थोड़े बदलाव के साथ एक राह तलाशी जा सकती थी।
उन्होंने कहा कि किसान सरकार से लगातार बातचीत करने की बात कर रहे थे, लेकिन केंद्र की तरफ से बातचीत की कोई पहल नहीं की जा रही थी। यह स्थिति केंद्र की हठधर्मी सोच को दिखा रही थी। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री कानून को समाप्त करते समय भी लोगों से बातचीत कर बेहतर तरीके से हल निकाल सकते थे।