अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे के बाद वहां हालात लगातार खराब होते जा रहे हैं। भारत समेत दुनिया भर के नागरिकों को वहां से एयरलिफ्ट किया जा रहा है। इस बीच अफगानिस्तान में तालिबान का सत्ता कायम होने से भारत भी चिंता में है। तालिबान को मान्यता देने के मामले पर आगे बढ़ें या पीछ हटे यह सरकार के सामने एक बडी चुनौती है।
इसी मसले पर सरकार ने 26 अगस्त को सर्वदलीय बैठक बुलाई गई है। विदेश मंत्री एस जयंशकर सभी दलों के नेताओं को पूरे मामले की जानकारी देंगे और उनकी राय लेंगे। ऐसे में हमने विदेश मामलों के जानकारों से यह समझने की कोशिश की है कि अफगानिस्तान को लेकर भारत सरकार का इस मामले पर क्या रुख होना चाहिए।
विदेश मामलों के जानकार और इमेज इंडिया के अध्यक्ष रॉबिन्दर सचदेव
अफगानिस्तान के मौजूदा हालात को देखते हुए भारत के लिए अभी वेच एंड वॉट नीति ही सर्वश्रेष्ठ है लेकिन इसमें अब रचनात्मक नीति की बात करनी चाहिए। यानी वेट एंड वॉच एंड क्रिएटिव पॉलिसी अपनाना (प्रतीक्षा और देखने और रचनात्मक नीति) ठीक रहेगा। वेट एंड वॉच पॉलिसी के जरिए भारत के पास यह देखने का एक बड़ा मौका होगा कि शरीया कानून के तहत तालिबान किस तरह का शासन चलाते हैं। क्योंकि तालिबान का जो इतिहास रहा है उससे हमें इस बात की आशा नहीं रखनी चाहिए कि उनकी सोच या उनकी विचारधारा में कोई क्रांतिकारी बदलाव हो जाएगा।
भारत ही नहीं पूरी दुनिया के लिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि तालिबान राज में अल्पसंख्यकों और खासतौर पर महिलाओं की क्या स्थिति रहने वाली है। वे शरीया कानून के तहत कैसे सरकार चलाएगें। यदि वे अपने कट्टरपंथी शासन में महिलाओं की आजादी पर पाबंदी लगा दें तो क्या भारत समेत दुनिया के दूसरे देश इसे मंजूर करेंगे। इसलिए अभी अच्छा है कि भारत थोड़ा सब्र रखे और अमेरिका समेत तालिबान के विरोधी दूसरे देशों के साथ इस पर बातचीत करे कि अफगानिस्तान को मानवता के आधार पर विदेशी सहायता यदि दी जाए तो इन कठोर शर्तों के साथ कि वे अफगान नागरिकों के अधिकारों का हनन किसी भी हाल में नहीं करेंगे।
दूसरी तरफ भारत को इस बारे में भी सोचना चाहिए कि अमेरिका इस मुद्दे पर जी 7 में क्यों चर्चा कर रहा है, इस पर तो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में चर्चा होनी चाहिए क्योंकि तालिबान के शासन आने से मानवाधिकार और महिलाओं की आजादी पर सबसे बड़ा खतरा मंडरा रहा है और पूरी दुनिया के लिए यह बहुत बड़ा मुद्दा है। वहीं भारत को तालिबान के विरोध में खड़े हुए नॉर्थ अलायंस से ज्यादा उम्मीद नहीं करनी चाहिए। क्योंकि तालिबान लड़ाकों के पास अभी जिस तरह के हथियार उपकरण हाथ लग गए हैं नार्थन अलायंस उनसे ज्यादा देर तक मुकाबला नहीं कर सकता।
पंजशीर अफगानिस्तान के 34 में से एक प्रांत है, वो तालिबान से ज्यादा समय तक नहीं लड़ सकते। अफगानिस्तान के पूर्व उपराष्ट्रपति अमरुल्ला सालेह ने तालिबान के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी है। उन्होंने खुद को अफगानिस्तान का कार्यवाहक राष्ट्रपति घोषित किया है, वे अब दुनिया से समर्थन मांग रहे हैं। लेकिन जब वे तब कुछ नहीं कर पाए जब उनके पास तीन लाख आर्मी थी, अमेरिका का समर्थन हासिल था, तो अब वे तालिबान से कितना और किस तरह मुकाबला करसकते हैं, यह बड़ा सवाल है।
भारत के लिए चिंता की एक और बात है कि ईरान के अमेरिका के साथ संबंध ठीक नहीं हैं इसलिए वो भी तालिबान को मान्यता देने के पक्ष में ही नज़र आ रहा है। अमेरिका ने अभी तक ईरान के दूसरे देशों के साथ व्यापारिक संबंधों पर पाबंदी लगा रखी है। भारत को तुरंत अमेरिका पर इस बात के लिए दबाव डालना चाहिए कि वह ईरान के ऊपर लगी इस पाबंदी को खत्म करे। इस पाबंदी के कारण भारत भी ईरान के साथ व्यापार नहीं कर पा रहा है। अभी हम ईरान से तेल नहीं खरीद पा रहे हैं। ऐसे में ईरान का झुकाव भी चीन की तरफ हो जाएगा और यह भारत को मुश्किल में डाल सकता है।
रक्षा विशेषज्ञ मेजर जनरल ए के सिवाच (रिटायर्ड)
अभी हमारी प्राथमिकता वहां से हमारे लोगों को बाहर निकालने की होनी चाहिए। सिर्फ काबुल में ही नहीं है बल्कि अफगानिस्तान के कई प्रांत में हमारे लोग काम कर रहे हैं। वहां भारत की 37 परियोजनाएं चल रही थी। भारत ने वहां संसद बनाया, पुल बनाया, सड़कें, अस्पताल बनाए हैं। कई परियोजनाएं शुरू हो गईं तो कुछ पर काम काम चल रहा है। इसलिए भारतीय नागरिकों को सुरक्षित बाहर निकाला जाना चाहिए।
दूसरी बार जो बेहद महत्वपूर्ण है कि तालिबान को लेकर अभी हम वेट एंड वॉच पॉलिसी का पालन कर रहे हैं। अभी के हालत में यही नीति ठीक है। तालिबान सरकार बनाने की तैयारी में लगा है। कई समूह इस सरकार का हिस्सा बन सकते हैं। पाकिस्तान हक्कानी ग्रूप को भी सरकार में शामिल कराने की कोशिश में लगा हुआ है। निश्चित तौर पर तालिबानी सत्ता चरमपंथी गुट की सरकार होगी, लेकिन कौन-कौन लोग इसमें शामिल होंगे भारत को इस बारे में नहीं पता। जिस तरह उन्होंने सरकार बनाने से पहले ही वहां आतंक मचा रखा है, उन पर भरोसा करना मुश्किल है।
यह ठीक है कि भारत ने तालिबान ने हमेशा एक उचित दूरी बनाकर रखी है, लेकिन जब एक बार सरकार बन जाएगी तो हमें उनके साथ बातचीत करनी ही पड़ेगी। नहीं तो वहां चल रही हमारी अरबों डॉलर की परियोजनाओं का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। अफगानिस्तान के साथ हमारे कई हित जुड़े हुए हैं और यदि इन परियोजानाओं को झटका लगता है तो इससे अफगान नागिरकों का बहुत नुकसान होगा।
हमारे पास कोई विकल्प नहीं है, इसलिए हमें तालिबान के साथ बातचीत का रास्ता खोलना ही पड़ेगा। उनके साथ बातचीत इसलिए भी जरूरी है कि तालिबान सरकार पर केवल चीन और पाकिस्तान ही हावी नहीं रहे। चीन अफगानिस्तान में भारी निवेश करना चाहता है। अफगानिस्तान के संसाधनों पर उसकी नजर है। चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडर से भी चीन को फायदा मिल रहा है। इसलिए चीन बहुत उत्सुक है जैसे ही सरकार बने वह उसे मान्यता दे।
तालिबान लाख दावा करे कि वो 'अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन का इस्तेमाल किसी दूसरे देश पर हमलों के लिए नहीं होने देगा', लेकिन ये सच्चाई है कि चीन और पकिस्तान भारत के ख़िलाफ़ इसका पूरा फ़ायदा उठाने के कोशिश जरूर करेंगे। तालिबान के साथ पाकिस्तान का होना भारत के लिए बड़ी चिंता की बात है। इसलिए अपनी सुरक्षा और संप्रभुता को देखते हुए भारत के लिए तालिबान से बातचीत करना बेहद ज़रूरी होगा।