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रास बिहारी बोस: 26 साल की उम्र में अंग्रेज वायसराय पर फेंका था बम

Sun, 10 May 2020 01:35 PM IST
Sneha Baluni न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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स्वतंत्रता सेनानी रास बिहारी बोस (फाइल फोटो) - फोटो : Facebook
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23 दिसंबर 1912 को दिल्ली में जैसे ही ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड हार्डिंज ने हाथी की पीठ पर बैठकर कदम रखा वैसे ही एक तेज धमाका हुआ। इसका उद्देश्य हार्डिंज की मौत था लेकिन इससे उसके सेवक की मौत हो गई। इस धमाके के मास्टरमाइंड 26 साल के रास बिहारी बोस थे।

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बोस एक बंगाली क्रांतिकारी थे। जो अंग्रेजों के वफादार के तौर पर नजर आते थे लेकिन चुपके से उन्हें भारत से हटाने की कोशिशों में जुटे हुए थे। उनके द्वारा किया गया हमला बेशक विफल रहा लेकिन इससे उन्हें वहां मौजूद हजारों लोगों और दुनिया को यह बताने का मौका मिल गया कि कुछ भारतीय बल के जरिए अंग्रेजों को बाहर निकालने की तैयारी कर रहे हैं।


अंग्रेजी हुकूमत ने 1858 में राष्ट्रव्यापी विद्रोह को दबाने के बाद भारत को अपने शासन का हिस्सा बनाया था। यह विद्रोह ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ था जिसे राजसिंहासन की तरफ से संचालित किया जा रहा था। हत्या के असफल प्रयास के बाद बोस के पांच कॉमरेड पकड़े गए और उनके खिलाफ दिल्ली में षड्यंत्र का मुकदमा चला। जिसमें से एक को आजीवन कारावास तो बाकी चार को मौत दी गई।
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बोस के सिर पर ईनाम रखा गया था लेकिन वे 1915 में भारत से भागकर जापान पहुंचने में कामयाब रहे। जहां वे एक महत्वपूर्ण कार्यकर्ता बन गए। यहां उन्होंने इंडियन नेशनल आर्मी की स्थापना की। आज मोहनदास करमचंद गांधी और जवाहरलाल नेहरू जैसे प्रमुख भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों के नाम को विश्व इतिहास में स्थान मिला है लेकिन रास बिहारी बोस के बारे में बहुत कम लोगों ने सुना है। हालांकि जापान में उनकी दास्तान किसी लीजेंड से कम नहीं है। 

1886 में बंगाल में हुआ था जन्म
रास बिहारी बोस का जन्म 1886 में बंगाल में हुआ था। वे ब्रिटिश शासन के दौरान सामने आने वाली परिस्थितियों में पले-बढ़े। स्कूल छोड़ने के बाद उन्होंने भारतीय सेना में शामिल होने की कई बार कोशिश की लेकिन असफल रहे। इसके बाद उन्हें उत्तराखंड के देहरादून में स्थित वन अनुसंधान संस्थान में क्लर्क की नौकरी मिली। संस्थान में रहते हुए उन्हें देशभर में घूमने का मौका मिला और इसका इस्तेमाल उन्होंने गुप्त रूप से उपनिवेश विरोधी क्रांतिकारी नेटवर्क बनाने के लिए किया। सालों तक अंग्रेजों को उनपर शक नहीं हुआ।

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