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Punjab Election Result: 10 साल में दो राज्य में सत्ता, दिल्ली से पंजाब तक कैसा रहा आप का सफर?

Thu, 10 Mar 2022 07:02 PM IST
प्रतिभा ज्योति न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।

सार

अरविंद केजरीवाल की नेतृत्व वाली पार्टी ने 2015 में 70 सीटों वाली दिल्ली विधानसभा में 67 सीटें जीतकर राज्य में सत्ता बरकरार रखने की कोशिश की थी। लेकिन, पांच साल के उनके सफर में कई साथियों ने साथ छोड़ दिया या वे बाहर कर दिए गए।
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आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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पंजाब में आम आदमी पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिल गया है। वहीं कैप्टन अमरिंदर सिंह समेत कई दिग्गज मात खा गए हैं। आप को प्रचंड बहुमत के बाद पूरे पंजाब के आप कार्यकर्ताओं में जश्न है। आम आदमी पार्टी के सीएम उम्मीदवार भगवंत मान ने संगरूर में पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ जीत का जश्न मनाया। भगवंत मान इस दौरान अपनी मां को भी गले लगाते दिखे। 
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पंजाब में आप को मिली जीत से पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल गदगद हैं। आप की जीत को उन्होंने इंकलाब बताया। उन्होंने भगवंत मान के साथ अपनी फोटो ट्वीट कर उन्हें बधाई दी।

ऐसे में यह जानने की दिलचस्पी जरूर जगती है कि आखिर आम आदमी पार्टी ने दिल्ली से पंजाब तक का सफर कैसे तय किया है? इस दौरान पार्टी ने कितने उतार-चढ़ाव देखे हैं?
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जानिए दिल्ली से पंजाब तक कैसा रहा है आम आदमी पार्टी का सफर?
जनलोकपाल बिल बनाने की मांग को लेकर पांच अप्रैल 2011 को सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने अनशन शुरू किया था।

माना जाता है कि अरविंद केजरीवाल इस आंदोलन के सूत्रधार थे। वे इस आंदोलन के नायक बन कर उभरे।

अन्ना के आंदोलन को किरण बेदी, कुमार विश्वास, जनरल वीके सिंह, योगेंद्र यादव जैसी हस्तियों ने समर्थन दिया। 

सरकार ने इस बिल के लिए एक समिति बनाने का वादा किया। इसके बाद यह आंदोलन नौ अप्रैल 2011 को समाप्त हो गया।

जब सरकार ने आश्वासन के बाद भी 15 अगस्त तक विधेयक पास नहीं हुआ तो 16 अगस्त 2011 को अन्ना ने दोबारा आंदोलन शुरू किया। 

इस आंदोलन को देश भर का समर्थन मिला। आखिरकार सरकार आनन-फानन में यह विधेयक संसद में लेकर आई।

संसद से विधेयक के पारित होने के बाद अन्ना का आंदोलन खत्म हुआ।

अरविंद केजरीवाल। - फोटो : अमर उजाला।
अन्ना अपने आंदोलन से राजनीति को दूर रखते थे, लेकिन इस आंदोलन के खत्म होते ही आम आदमी पार्टी का जन्म हुआ। 

नवंबर 2012 में आम आदमी पार्टी का आधिकारिक तौर पर गठन हुआ। 

तब वकील और कार्यकर्ता शांति भूषण, प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, कुमार विश्वास केजरीवाल के साथी थे। 

2012 में बनी आम आदमी पार्टी ने 2013 में दिल्ली में अपना पहला चुनाव लड़ा। सरकार भी बनाई।

70 सीटों वाली दिल्ली विधानसभा में आप दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। उसे 28 सीटें मिलीं। 

कांग्रेस ने उसे बाहर से समर्थन दिया और दिल्ली में केजरीवाल की सरकार बन गई। हालांकि 49 दिन बाद केजरीवाल ने इस्तीफा दे दिया।

2014 लोकसभा चुनाव में बेहद खराब प्रदर्शन रहा। 400 सीटों पर चुनाव लड़ा, 4 पर जीत मिली।

2015 दिल्ली विधानसभा चुनाव में प्रचंड जीत मिली। 2017 दिल्ली नगर निगम और 2019 लोकसभा चुनाव में खराब प्रदर्शन रहा।

अरविंद केजरीवाल और भगवंत मान। - फोटो : twitter @ArvindKejriwal
2015 में दिल्ली में प्रचंड जीत
2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में प्रचंड जीत हासिल की। आप को 70 में से 67 सीटें मिलीं।

पांच साल के उनके सफर में कई साथियों ने साथ छोड़ दिया या वे बाहर कर दिए गए।

अप्रैल 2015 में योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण और आनंद कुमार को आप से निकाल दिया गया।

दिल्ली के बाद धीरे-धीरे आप ने दूसरे राज्यों में अपना विस्तार शुरू किया।

2017 में आप ने पंजाब विधानसभा चुनाव लड़ा और 20 सीटें हासिल कीं।

2019  के लोकसभा चुनाव में आप को दिल्ली में एक भी सीट नहीं मिली। 
इस लोकसभा चुनाव में पार्टी को केवल एक सीट पंजाब से मिली।

पंजाब के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार भगवंत मान ने पंजाब के संगरूर की सीट जीती थी। 

दिल्ली में कामयाबी से अपनी सरकार चलाने के बाद आम आदमी पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी के विस्तार में जुट गई।

इसी सिलसिले में पार्टी अभी हुए उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा और पंजाब में भी विधानसभा चुनाव लड़ी।

पंजाब में यह सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। वह राज्य में पहली बार सरकार बनाने जा रही है। 

अरविंद केजरीवाल पर कुमार विश्वास ने लगाया आरोप। - फोटो : फाइल
साथी जो बिछड़े बारी-बारी 
अरविंद केजरीवाल की नेतृत्व वाली पार्टी ने 2015 में 70 सीटों वाली दिल्ली विधानसभा में 67 सीटें जीतकर राज्य में सत्ता बरकरार रखने की कोशिश की थी।

लेकिन, पांच साल के उनके सफर में कई साथियों ने साथ छोड़ दिया या वे बाहर कर दिए गए।

पत्रकार आशुतोष पार्टी की सरोकार और साफ-सुथरी राजनीति से प्रभावित होकर 2014 में पार्टी में शामिल हुए थे।

वे 2014 का लोकसभा चुनाव भाजपा के हर्षवर्धन के खिलाफ चांदनी चौक से लड़ा थे, लेकिन वे हार गए थे। 





बाद में धीरे-धीरे वे आम आदमी पार्टी से दूर होते गए। 2018 में उन्होंने पार्टी छोड़ दी और पत्रकारिता में वापसी की। 

आप के सह-संस्थापकों में से एक शाजिया इल्मी ने मई 2014 में यह कहते हुए पार्टी छोड़ दी कि वह अपने मूल मूल्यों से भटक गई है।

बाद में वह भाजपा में शामिल हो गईं। अभी वे भाजपा की मुख्य प्रवक्ता हैं। 

कुमार विश्वास भी केजरीवाल के साथ कथित मतभेदों के कारण वे पार्टी से अलग हो गए।
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अरविंद केजरीवाल। - फोटो : फाइल
वहीं सह-संस्थापकों में से एक योगेंद्र यादव को मार्च 2015 में पार्टी विरोधी गतिविधियों  के कारण निष्कासित कर दिया गया था।

बाद में उन्होंने चुनावी राजनीति में ईमानदारी, पारदर्शिता और जवाबदेही लाने के मिशन के साथ एक अलग पार्टी 'स्वराज इंडिया' की स्थापना की।

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील 2012 में आप में इस उम्मीद के साथ शामिल हुए कि यह पार्टी भ्रष्टाचार से मुक्त होगी। 

हालांकि, उन्हें भी योगेंद्र यादव के साथ पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण पार्टी से बर्खास्त कर दिया गया था। बाद में प्रशांत भूषण ने खुद को राजनीति से दूर कर लिया।

पार्टी के पूर्व नेता कपिल मिश्रा ने सीएम केजरीवाल और दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन के खिलाफ सार्वजनिक तौर पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए।

उन्होंने खुद को दो करोड़ रुपये के घोटाले का चश्मदीद गवाह भी बताया तो कपिल मिश्रा को मई 2017 में निलंबित कर दिया। 

इसी तरह किसी न किसी वजह से अल्का लांबा और अंजलि दमानिया भी पार्टी से दूर हो गईं। 
 
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