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Punjab Election 2022: अमरिंदर का हाथ अब भाजपा के साथ, पंजाब चुनाव में इस गठबंधन से किसका खेल बिगड़ेगा

प्रतिभा ज्योति
Updated Mon, 06 Dec 2021 02:33 PM IST

सार

तीनों कृषि कानून वापस लिए जाने के बाद से ही यह तय माना जा रहा था कि कैप्टन अमरिंदर की पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के बीच गठबंधन में कोई रुकावट नहीं है लेकिन क्या सत्तारूढ़ कांग्रेस, आप और शिरोमणि अकाली दल के बाद पंजाब में भाजपा-अमरिंदर गठबंधन चौथी ताकत बनकर उभरेगा?
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केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मिलते अमरिंदर सिंह (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
जिस बात के संकेत गृह मंत्री अमित शाह ने शनिवार को दिए थे, पंजाब के पूर्व सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह ने सोमवार को उस पर मुहर लगा दी। कैप्टन ने सोमवार को चंडीगढ़ में अपनी पार्टी पंजाब लोक कांग्रेस के दफ्तर के उद्घाटन के मौके पर अगला विधानसभा चुनाव भाजपा के साथ लड़ने का एलान कर दिया है। अमरिंदर ने कहा कि उन्होंने इस बारे में अमित शाह से बात की है। हालांकि, सीटों पर समझौता होना बाकी है। पंजाब में अगले साल फरवरी के बाद चुनाव होने की संभावना है। 

संभावना है कि इस गठबंधन में पूर्व शिअद नेता और अकाली दल (संयुक्त) के अध्यक्ष सुखदेव सिंह ढींढसा भी शामिल होंगे। हालांकि ढींढसा ने गुरुवार को गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की थी लेकिन उन्होंने इस पर कुछ भी कहने से इंकार कर दिया था। जबकि गठबंधन को लेकर शाह ने शनिवार को बयान दिया था कि पंजाब विधानसभा चुनाव के लिए पूर्व सीएम अमरिंदर सिंह और ढींढसा के साथ बातचीत जारी है और उम्मीद है कि दोनों के साथ बात बन जाएगी।


अमरिंदर-भाजपा गठबंधन से किसका खेल बिगड़ेगा
क्या सत्तारूढ़ कांग्रेस, आप और शिरोमणि अकाली दल के बाद पंजाब में भाजेपी-अमरिंदर गठबंधन चौथी ताकत बनकर उभरेगा? इस बारे में राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर 2022 के विधानसभा चुनाव में यदि विभिन्न कारणों से यह गठबंधन किंगमेकर नहीं बना तो खेल बिगाड़ने वाला तो बन ही सकता है।

पंजाब की राजनीति की समझ रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार राजकुमार सिंह बताते हैं कि इस गठबंधन से सबसे ज्यादा नुकसान आम आदमी पार्टी का होगा। हालांकि इस अमरिंदर सिंह की कोशिश होगी कांग्रेस का खेल बिगाड़ने की लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान आप को पहुंचता दिख रहा है। इसकी वजह यह है कि अमरिंदर और ढींढसा का कोई पारंपरिक वोट बैंक नहीं है। उन्हें गैर पारंपरिक वोट मिल सकता है। यही आम आदमी पार्टी का वोट बैंक है। जबकि कांग्रेस के पास एक पारंपरिक वोट बैंक है। कैप्टन से पहले भी कांग्रेस की सरकार यहां रही है। उनके मुताबिक संभावना है कि इस गठबंधन की वजह से त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति बन जाए। जिससे दूसरा बड़ा नुकसान कांग्रेस का हो सकता है। त्रिशंकु विधानसभा अमरिंदर और भाजपा के हक में हो सकता है।  

 
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केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मिलते अमरिंदर सिंह (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
जिस बात के संकेत गृह मंत्री अमित शाह ने शनिवार को दिए थे, पंजाब के पूर्व सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह ने सोमवार को उस पर मुहर लगा दी। कैप्टन ने सोमवार को चंडीगढ़ में अपनी पार्टी पंजाब लोक कांग्रेस के दफ्तर के उद्घाटन के मौके पर अगला विधानसभा चुनाव भाजपा के साथ लड़ने का एलान कर दिया है। अमरिंदर ने कहा कि उन्होंने इस बारे में अमित शाह से बात की है। हालांकि, सीटों पर समझौता होना बाकी है। पंजाब में अगले साल फरवरी के बाद चुनाव होने की संभावना है। 

संभावना है कि इस गठबंधन में पूर्व शिअद नेता और अकाली दल (संयुक्त) के अध्यक्ष सुखदेव सिंह ढींढसा भी शामिल होंगे। हालांकि ढींढसा ने गुरुवार को गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की थी लेकिन उन्होंने इस पर कुछ भी कहने से इंकार कर दिया था। जबकि गठबंधन को लेकर शाह ने शनिवार को बयान दिया था कि पंजाब विधानसभा चुनाव के लिए पूर्व सीएम अमरिंदर सिंह और ढींढसा के साथ बातचीत जारी है और उम्मीद है कि दोनों के साथ बात बन जाएगी।

अमरिंदर-भाजपा गठबंधन से किसका खेल बिगड़ेगा
क्या सत्तारूढ़ कांग्रेस, आप और शिरोमणि अकाली दल के बाद पंजाब में भाजेपी-अमरिंदर गठबंधन चौथी ताकत बनकर उभरेगा? इस बारे में राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर 2022 के विधानसभा चुनाव में यदि विभिन्न कारणों से यह गठबंधन किंगमेकर नहीं बना तो खेल बिगाड़ने वाला तो बन ही सकता है।

पंजाब की राजनीति की समझ रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार राजकुमार सिंह बताते हैं कि इस गठबंधन से सबसे ज्यादा नुकसान आम आदमी पार्टी का होगा। हालांकि इस अमरिंदर सिंह की कोशिश होगी कांग्रेस का खेल बिगाड़ने की लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान आप को पहुंचता दिख रहा है। इसकी वजह यह है कि अमरिंदर और ढींढसा का कोई पारंपरिक वोट बैंक नहीं है। उन्हें गैर पारंपरिक वोट मिल सकता है। यही आम आदमी पार्टी का वोट बैंक है। जबकि कांग्रेस के पास एक पारंपरिक वोट बैंक है। कैप्टन से पहले भी कांग्रेस की सरकार यहां रही है। उनके मुताबिक संभावना है कि इस गठबंधन की वजह से त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति बन जाए। जिससे दूसरा बड़ा नुकसान कांग्रेस का हो सकता है। त्रिशंकु विधानसभा अमरिंदर और भाजपा के हक में हो सकता है।  

 

अमित शाह के साथ कैंप्टन अमरिंदर सिंह (फाइल फोटो) - फोटो : PTI (File Photo)
यह ड्रॉप-आउट का गठबंधन होगा।
पंजाब चुनाव में बन रहे इस नए समीकरण को ड्रॉप आउट गठबंधन माना जा रहा है। कैप्टन खुद कांग्रेस छोड़ चुके हैं, जबकि रणजीत सिंह ब्रह्मपुरा और सुखदेव सिंह ढींढसा शिरोमणि अकाली दल (शिअद) के संस्थापक सदस्यों में से हैं। कैप्टन और भाजपा की कोशिश है कि अन्य दलों के उन असंतुष्टों को भी गठबंधन में शामिल किया जाए जिन्हें टिकट से वंचित कर दिया जाएगा। कैप्टन अमरिन्दर सिंह जहां भाजपा के साथ गठजोड़ करके और एक राजनीतिक पार्टी शुरू करके अपने राजनीतिक करियर को फिर से जिंदा करना चाहते हैं। वहीं भाजपा अपने दशकों पुराने साथी शिरोमणि अकाली दल के अलग होने के बाद अपनी राजनीतिक जमीन को मजबूत करने में जुटी है। हालांकि राज्य में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी भी गुटबाजी और अन्य मुद्दों से जूझ रही हैं।

भाजपा को क्या होगा फायदा
पंजाब में भाजपा का कोई मजबूत आधार नहीं रहा है। अभी 117 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा के केवल दो विधायक हैं। पिछले दो दशक से वह शिरोमणि अकाली दल के साथ मिलकर वह सियासत कर रही थी। लेकिन किसान आंदोलन के कारण अकाली दल ने भाजपा के साथ गठबंधन तोड़ दिया था। जिसके बाद से भाजपा यहां अलग-थलग पड़ गई थी। दूसरी तरफ किसान आंदोलन के कारण पंजाब में भाजपा के खिलाफ जबरदस्त नाराजगी थी। ऐसे में अमरिंदर सिंह और ढींढसा का साथ मिलने से भाजपा का हाथ यहां मजबूत होगा। खासकर अमरिंदर के जरिए भाजपा को ग्रामीण इलाकों के कुछ वोट हासिल हो सकते हैं। हालांकि सूत्रों का कहना है कि अकाली दल के विभाजन में भाजपा का ही हाथ रहा है और भाजपा लंबे समय से इस मिशन पर लगी थी। लेकिन बादल विरोधी ताकतों का साथ मिलने से भाजपा को कोई खास फायदा नहीं मिलने की उम्मीद है।  

 

अमित शाह के साथ कैंप्टन अमरिंदर सिंह (फाइल फोटो) पंजाब चुनाव 2022 - फोटो : PTI (File Photo)
भाजपा और कप्तान के सामने चुनौतियां क्या
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक यह गठबंधन चुनौतियों से भरा होगा। चुनाव में कुछ ही महीने बचे हैं, इसलिए पार्टी बनाना और संगठन को मजबूत करना कोई आसान काम नहीं होगा। विपक्षी दल पहले ही भाजपा विरोधी भावनाओं का फायदा उठा चुके हैं। इसलिए, कृषि कानूनों को निरस्त कर दिए जाने पर भी किसानों का विश्वास जीतना आसान नहीं होगा।

एक और बड़ी चुनौती सत्ता विरोधी लहर होगी। जानकारों का मानना है कि कैप्टन केवल कांग्रेस से इस्तीफा देकर और नई पार्टी बनाकर सत्ता विरोधी लहर के बोझ से छुटकारा नहीं पा सकते क्योंकि वे करीब साढ़े चार साल तक पार्टी के मुख्यमंत्री रहे हैं। उन पर मुख्यमंत्री के तौर पर अच्छा प्रदर्शन नहीं करने का आरोप और सत्ता विरोधी लहर का बोझ है, जिसका असर भाजपा पर भी पड़ सकता है। कांग्रेस इन्हीं मुद्दों को लेकर अमरिंदर के खिलाफ चुनाव में उतरेगी। लिहाजा इन आरोपों से पार पाना कैप्टन और भाजपा दोनों के लिए चुनौतीपूर्ण होगा।

हालांकि भाजपा-कप्तान गठबंधन अति राष्ट्रवाद का मिश्रण होगा। भाजपा और कैप्टन दोनों राष्ट्रवादी हैं। कैप्टन ने अपने 50 साल के करियर में अपने राष्ट्रवाद और धार्मिक पहचान को बनाए रखा है। इसलिए यह गठबंधन कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के लिए एक चुनौती तो जरूर पेश करेगी। 
 
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