फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

President Election: ममता बनर्जी विपक्ष के धुर विरोधी राजनीतिक दलों को भी साथ लाने में हुईं कामयाब, इन नामों पर हुई चर्चा

सार

कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व भी ममता बनर्जी की अगुवाई वाले किसी मंच पर साथ आने से हिचकता रहा है, लेकिन बुधवार की बैठक में कांग्रेस पार्टी के नेता भी शामिल हुए। पार्टी ने मल्लिकार्जुन खड़गे, जयराम रमेश और राहुल गांधी के विश्वस्त रणदीप सुरजेवाला को बैठक में भेजकर इसके प्रति अपनी संवेदनशीलता जाहिर की...
विज्ञापन
President Election: ममता बनर्जी की अगुवाई में विपक्षी दलों की बैठक - फोटो : Agency
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

ममता बनर्जी ने आज वह काम कर दिखाया है, जो विपक्ष के बड़े-बड़े राजनेता नहीं कर सके। उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव में एक साझा उम्मीदवार खड़ा करने के लिए विपक्ष के कई बड़े दलों को साधने में सफलता हासिल कर ली है। इसमें ऐसे दल भी शामिल हैं, जिनकी राजनीति आपस में टकराती है और अब तक वे एक साथ एक मंच पर दिखने से बचते रहे हैं। लेकिन ममता बनर्जी इन दलों को एक साथ एक मंच पर लाने में कामयाब रहीं। विपक्ष के नेता के तौर पर यह उनकी बड़ी सफलता है। भविष्य में यह उनकी राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भागीदारी की राह भी खोलता है।

विज्ञापन


राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष की ओर से साझा उम्मीदवार खड़ा करने पर सभी दलों में सहमति बनाने के लिए ममता बनर्जी ने बुधवार को दिल्ली में एक बैठक बुलाई थी। इस बैठक में तृणमूल कांग्रेस के अलावा कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस, शिवसेना, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल (सेक्युलर), पीडीपी, नेशनल कांफ्रेंस, डीएमके, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय लोकदल, झाऱखंड मुक्ति मोर्चा, सीपीआई और सीपीआई (एम) शामिल हुईं।

इन दलों में ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस और वामपंथी दलों की राजनीति पश्चिम बंगाल की स्थानीय राजनीति के कारण आपस में टकराती है। ममता बनर्जी वामदलों को हटाकर ही बंगाल में सत्ता तक पहुंचने में कामयाब रही हैं। लिहाजा दोनों दलों में बंगाल में अपनी पकड़ मजबूत करने को लेकर हमेशा तनाव रहता है।

साझा उम्मीदवार उतारने पर चर्चा

कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व भी ममता बनर्जी की अगुवाई वाले किसी मंच पर साथ आने से हिचकता रहा है, लेकिन बुधवार की बैठक में कांग्रेस पार्टी के नेता भी शामिल हुए। पार्टी ने मल्लिकार्जुन खड़गे, जयराम रमेश और राहुल गांधी के विश्वस्त रणदीप सुरजेवाला को बैठक में भेजकर इसके प्रति अपनी संवेदनशीलता जाहिर कर दी है। इसी प्रकार, जम्मू-कश्मीर की राजनीति में पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस आपस में एक दूसरे के राजनीतिक प्रतिद्वंदी हैं। इन दलों को साथ लाना ममता बनर्जी की सफलता माना जा सकता है।

विज्ञापन


बैठक की समाप्ति के बाद ममता बनर्जी ने कहा है कि सभी विपक्षी दलों में आपस में इस बात पर सहमति बनी है कि राष्ट्रपति चुनाव में उनकी तरफ से एक साझा उम्मीदवार उतारा जाएगा। इस पद पर शरद पवार और गोपाल कृष्ण गांधी को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि शरद पवार ने अपनी जीत पूरी तरह सुनिश्चित न होने के कारण मैदान में उतरने से मना कर दिया है, तो गोपाल कृष्ण गांधी भी इस मुद्दे पर अपनी सहमति देने से पहले कुछ समय लेना चाहते हैं। शायद वे भी अपने नाम पर सभी दलों में पूर्ण सहमति होने के बाद ही मैदान में उतरने पर अपनी मुहर लगाएं। सहमति न मिलने पर इनके अलावा अन्य नामों पर भी विचार किया जा सकता है।

लेकिन इस पूरी कवायद में जिस तरह ममता बनर्जी ने समूचे विपक्ष को एक साथ साधने का प्रयास किया है, उसने अचानक उनका राजनीतिक कद बढ़ा दिया है। यदि विपक्ष अपने उम्मीदवार को कड़ी चुनौती देने की स्थिति में लाने में सफल रहता है तो इस राजनीतिक लड़ाई को रोचक बनाने का श्रेय ममता बनर्जी को ही दिया जाएगा। भाजपा की राजनीतिक स्थिति देखते हुए यह कहना मुश्किल है कि विपक्ष अपना राष्ट्रपति उम्मीदवार जिताने में कामयाब रहेगा। लेकिन इस पूरी रस्साकसी का लाभ ममता बनर्जी को मिलना तय है।

साथ जोड़ने वाला बिंदु क्या

आपसी राजनीति में एक दूसरे के धुर विरोधी दलों का इस तरह साथ आना कई मायने में महत्त्वपूर्ण है। यह 2024 के लोकसभा चुनाव में सभी विपक्षी दलों के बीच सहमति बनने का पहला पड़ाव भी कहा जा सकता है। बड़ा प्रश्न है कि आखिर किस बिंदु ने इन सभी दलों को एक साथ आने को मजबूर कर दिया। माना जा रहा है कि भाजपा और नरेंद्र मोदी की राजनीति ने कई प्रदेशों के कई राजनीतिक दलों के सामने अस्तित्व बचाने की चुनौती पैदा कर दी है।

ममता बनर्जी ने पिछले विधानसभा चुनाव में अपना किला न केवल बरकरार रखा, बल्कि वे उसे ज्यादा मजबूत बनाने में भी कामयाब हुईं। लेकिन चुनाव के दौरान ममता बनर्जी के चेहरे पर तनाव साफ पढ़ा जा सकता था। भगवा दल अभी भी अपने एजेंडे से पीछे नहीं हटा है। अमित शाह और जेपी नड्डा लगातार बंगाल में अपनी सक्रियता बनाए हुए हैं। भाजपा आज भी वहां प्रमुख विपक्षी दल की भूमिका में है। वहीं, अन्य दलों के सामने भी भाजपा बड़ा खतरा बनकर उभर रही है।

विपक्ष के नेताओं का आरोप है कि ईडी, इनकम टैक्स और अन्य एजेंसियों के दुरुपयोग से विपक्षी दल के नेताओं को चुप कराने की कोशिश की जा रही है। राहुल गांधी इस समय ईडी की पूछताछ का सामना कर ही रहे हैं। ममता बनर्जी के राजनीतिक उत्तराधिकारी उनके भतीजे पर भी केंद्रीय एजेंसियों की तिरछी निगाह है। यूपी चुनाव में मायावती की चुप्पी को भी इससे जोड़ककर देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि विपक्षी दलों को एक साथ लाने में यह बिंदु सबसे कारगर भूमिका निभा रहा है।   

ये दल नहीं हुए शामिल

आम आदमी पार्टी ने राष्ट्रपति पद के लिए विपक्ष का साझा उम्मीदवार तय होने के बाद अपना निर्णय लेने की बात कही है। इसे अरविंद केजरीवाल की राष्ट्रीय राजनीति में अपनी दावेदारी से जोड़कर देखा जा रहा है। शायद वे सीधे तौर पर ममता बनर्जी के ‘झंडे के नीचे’ आने का संकेत नहीं देना चाहते हैं। इस तरह वे विपक्ष के एक सर्वमान्य नेता के तौर पर अपनी दावेदारी बनाए रखना चाहते हैं। उनके अलावा टीआरएस और बीजू जनता दल ने विपक्ष की बैठक से दूरी बनाए रखी। यही वह बिंदु है जहां से भाजपा को अपना उम्मीदवार जिताने की संभावना दिखाई पड़ रही है।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें