ममता बनर्जी ने आज वह काम कर दिखाया है, जो विपक्ष के बड़े-बड़े राजनेता नहीं कर सके। उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव में एक साझा उम्मीदवार खड़ा करने के लिए विपक्ष के कई बड़े दलों को साधने में सफलता हासिल कर ली है। इसमें ऐसे दल भी शामिल हैं, जिनकी राजनीति आपस में टकराती है और अब तक वे एक साथ एक मंच पर दिखने से बचते रहे हैं। लेकिन ममता बनर्जी इन दलों को एक साथ एक मंच पर लाने में कामयाब रहीं। विपक्ष के नेता के तौर पर यह उनकी बड़ी सफलता है। भविष्य में यह उनकी राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भागीदारी की राह भी खोलता है।
कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व भी ममता बनर्जी की अगुवाई वाले किसी मंच पर साथ आने से हिचकता रहा है, लेकिन बुधवार की बैठक में कांग्रेस पार्टी के नेता भी शामिल हुए। पार्टी ने मल्लिकार्जुन खड़गे, जयराम रमेश और राहुल गांधी के विश्वस्त रणदीप सुरजेवाला को बैठक में भेजकर इसके प्रति अपनी संवेदनशीलता जाहिर कर दी है। इसी प्रकार, जम्मू-कश्मीर की राजनीति में पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस आपस में एक दूसरे के राजनीतिक प्रतिद्वंदी हैं। इन दलों को साथ लाना ममता बनर्जी की सफलता माना जा सकता है।
आपसी राजनीति में एक दूसरे के धुर विरोधी दलों का इस तरह साथ आना कई मायने में महत्त्वपूर्ण है। यह 2024 के लोकसभा चुनाव में सभी विपक्षी दलों के बीच सहमति बनने का पहला पड़ाव भी कहा जा सकता है। बड़ा प्रश्न है कि आखिर किस बिंदु ने इन सभी दलों को एक साथ आने को मजबूर कर दिया। माना जा रहा है कि भाजपा और नरेंद्र मोदी की राजनीति ने कई प्रदेशों के कई राजनीतिक दलों के सामने अस्तित्व बचाने की चुनौती पैदा कर दी है।
ममता बनर्जी ने पिछले विधानसभा चुनाव में अपना किला न केवल बरकरार रखा, बल्कि वे उसे ज्यादा मजबूत बनाने में भी कामयाब हुईं। लेकिन चुनाव के दौरान ममता बनर्जी के चेहरे पर तनाव साफ पढ़ा जा सकता था। भगवा दल अभी भी अपने एजेंडे से पीछे नहीं हटा है। अमित शाह और जेपी नड्डा लगातार बंगाल में अपनी सक्रियता बनाए हुए हैं। भाजपा आज भी वहां प्रमुख विपक्षी दल की भूमिका में है। वहीं, अन्य दलों के सामने भी भाजपा बड़ा खतरा बनकर उभर रही है।
विपक्ष के नेताओं का आरोप है कि ईडी, इनकम टैक्स और अन्य एजेंसियों के दुरुपयोग से विपक्षी दल के नेताओं को चुप कराने की कोशिश की जा रही है। राहुल गांधी इस समय ईडी की पूछताछ का सामना कर ही रहे हैं। ममता बनर्जी के राजनीतिक उत्तराधिकारी उनके भतीजे पर भी केंद्रीय एजेंसियों की तिरछी निगाह है। यूपी चुनाव में मायावती की चुप्पी को भी इससे जोड़ककर देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि विपक्षी दलों को एक साथ लाने में यह बिंदु सबसे कारगर भूमिका निभा रहा है।
आम आदमी पार्टी ने राष्ट्रपति पद के लिए विपक्ष का साझा उम्मीदवार तय होने के बाद अपना निर्णय लेने की बात कही है। इसे अरविंद केजरीवाल की राष्ट्रीय राजनीति में अपनी दावेदारी से जोड़कर देखा जा रहा है। शायद वे सीधे तौर पर ममता बनर्जी के ‘झंडे के नीचे’ आने का संकेत नहीं देना चाहते हैं। इस तरह वे विपक्ष के एक सर्वमान्य नेता के तौर पर अपनी दावेदारी बनाए रखना चाहते हैं। उनके अलावा टीआरएस और बीजू जनता दल ने विपक्ष की बैठक से दूरी बनाए रखी। यही वह बिंदु है जहां से भाजपा को अपना उम्मीदवार जिताने की संभावना दिखाई पड़ रही है।