पूर्वांचल के माफिया डॉन के तौर पर बदनाम बसपा के बाहुबली विधायक मुख्तार अंसारी को बसपा सुप्रीमो मायावती ने इस बार टिकट देने से इनकार कर दिया है। मायवती के इस फैसले से राजनीतिक पंडित कुछ हैरान हैं। पिछले कुछ समय से लगातार मायावती ऐसे एलान कर रही हैं जिससे उनके बदले-बदले से होने का एहसास हो रहा है। बसपा ने शुक्रवार को विधानसभा चुनाव से जुड़ा बड़ा फैसला करते हुए कहा कि पार्टी का प्रयास होगा कि आगामी विधानसभा चुनाव में बसपा किसी भी बाहुबाली या माफिया से जुड़े आदमी को टिकट नहीं दे।
कहा जा सकता है कि मजबूरी में ही सही, पर मायावती की पार्टी ने अब मूर्तियों और स्मारकों के बाद अब माफियाओं से दूरी बनाने का फैसला कर लिया है। पार्क और मूर्तियां बनवाकर जनता के पैसों को पानी की तरह बहाने का आरोप झेलने वाली बसपा अपने चाल-चरित्र और चेहरे में बदलाव कर खुद को मजबूत विकल्प के तौर पर पेश करने की तैयारी में जुट गई है। सात सितंबर को लखनऊ में पार्टी कार्यालय पर आयोजित ब्राह्मण सम्मेलन में मायावती ने कहा कि 2022 में सरकार बनने पर वह पार्क, मूर्ति व संग्रहालय नहीं बनवाएंगी।
वहीं ‘तिलक तराजू और तलवार...... ” का नारा देने वाली बसपा का इस चुनाव में ब्राह्मणों पर ज्यादा प्यार उमड़ रहा है। वे ब्राह्मणों को अपने साथ जोड़ने की कवायद भी इसलिए कर रही हैं क्योंकि माना जा रहा है कि ब्राह्मण भाजपा से नाराज हैं। इसलिए बसपा ब्राह्मणों को उम्मीदवार बनाकर और चुनाव में उन्हें खड़ा करके 2022 के चुनाव में भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रही हैं। आखिर मायावती और बसपा के इतना बदल जाने की वजह क्या है?
बसपा के लिए करो या मरो की लड़ाई
जानकार बताते हैं कि मायावती 2022 चुनाव के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहती हैं, क्योंकि यह चुनाव बसपा के अस्तित्व को बचाए रखने की भी एक लड़ाई है। मायवती जानती हैं कि यह उनके लिए 'करो या मरो' की स्थिति है। मुख्तार को बसपा से बाहर करने की रणनीति भी इसलिए बनाई है ताकि भाजपा से मुकाबला करने में कोई कोर-कसर न रह जाए। योगी सरकार इन दिनों माफियाओं-बाहुबलियों और दूसरे अपराधियों के खिलाफ चलाए सख्ती बरत रही है। बसपा को डर है कि भाजपा पार्टी चुनाव में अपराध मुक्त शासन को बड़ा मुद्दा बना सकती है। ऐसे में मुख्तार अंसारी जैसे दागियों को बढ़ावा देने से भाजपा उस पर सियासी हमला कर सकती है।
दूसरी तरफ बसपा यह भी समझ रही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस तरह के विकास का मॉडल पेश किया है और भाजपा शासित राज्यों में जिस तरह के विकास कार्य हो रहे हैं, वहां अब जनता को मूर्तियों और पार्कों से नहीं बहलाया जा सकता। इसलिए विकास की राजनीति की बात करना अभी के सियासत की पहली जरूरत बन गई है।