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चक्रव्यूह: भाजपा-कांग्रेस दोनों को 'लाक्षागृह' से खतरा, विपक्ष के सामने राहुल को 'अभिमन्यु' मानने का धर्मसंकट

Mon, 14 Jun 2021 01:26 AM IST
सुरेंद्र जोशी जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली 

सार

जानकारों का कहना है कि 2022 ही 2024 का सेमीफाइनल है। उत्तरप्रदेश में अगले साल जो भी पार्टी सत्ता में आएगी, वह 2024 के लोकसभा चुनाव की राह को आसान बनाने में अहम रोल अदा करेगी। 
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सांकेतिक चित्र
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विस्तार
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देश में 2022 के लिए 'सियासत का चक्रव्यूह' तैयार हो रहा है। वजह, उत्तरप्रदेश, गुजरात और पंजाब सहित सात राज्यों में विधानसभा चुनाव हैं। राजनीतिक नुकसान यानी नेताओं की अदला-बदली या पार्टी का वजूद खत्म कर उसका विलय करा देना, ऐसे प्रयास भी शुरू हो रहे हैं। भाजपा और कांग्रेस, इन दोनों राष्ट्रीय पार्टियों को 'लाक्षागृह' से खतरा है। दोनों दलों के भीतर ऐसे लोग मौजूद हैं, जो चक्रव्यूह रचने के महारथी हैं। ये लोग जितना राजनीतिक नुकसान दूसरी पार्टी को पहुंचा सकते हैं, उससे कहीं ज्यादा अपनी पार्टी को भी 'लाक्षागृह' तक ले जा सकते हैं। इन सबके बीच विपक्ष, राहुल गांधी को 'अभिमन्यु' मानने के धर्मसंकट में फंसा है। 

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कहा जा रहा है कि इस बार अभिमन्यु की भूमिका किसी दूसरे नेता को दे दी जाए। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि 2022 ही 2024 का सेमीफाइनल है। उत्तरप्रदेश में अगले साल जो भी पार्टी सत्ता में आएगी, वह 2024 के लोकसभा चुनाव की राह को आसान बनाने में अहम रोल अदा करेगी। पिछले दिनों पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजों के बाद यह लग रहा था कि ममता बनर्जी, विपक्ष को लेकर कोई पहल करेंगी। अभी ऐसा कुछ नहीं हुआ है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि पश्चिम बंगाल में भाजपा और कांग्रेस की हार के बाद समीकरण बदल गए हैं। सभी पार्टियां अपनी रणनीति में बदलाव ला रही हैं। 
 

पवार व ममता ही करेंगे विपक्ष को एकजुट

एनसीपी नेता शरद पवार, जैसे ही विपक्षी पार्टियों को एक छतरी के नीचे लाने का प्रयास शुरू करते हैं, तो वैसे ही उनके या परिवार के किसी सदस्य के खिलाफ जांच एजेंसियां पूछताछ शुरू कर देती हैं। हालांकि अभी तक यह उम्मीद जीवित है कि देर सवेर शरद पवार और ममता बनर्जी जैसे नेता ही विपक्ष को एकजुट करने का प्रयास करेंगे। 

इस बार कांग्रेस पार्टी की तरफ से कोई पहल नहीं हो रही है, लेकिन पार्टी चाहती है कि जब कभी भाजपा के खिलाफ मोर्चा बने तो उसमें राहुल गांधी प्रमुख भूमिका में रहें। यह बात दूसरे दलों को तो अखरती ही है, साथ ही कांग्रेस पार्टी के भीतर भी एक हलचल का माहौल बन जाता है। 

कांग्रेस का घर दरकने लगा : प्रो. आनंद कुमार
राजनीतिक विशेषज्ञ एवं जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर डॉ. आनंद कुमार के अनुसार, इसमें कोई शक नहीं है कि कांग्रेस पार्टी, विपक्ष का नेतृत्व करने में सक्षम है। हालांकि यहां पर एक बड़ी बात यह है कि नेतृत्व कौन करेगा? मौजूदा परिस्थितियों में कांग्रेस का अपना घर दरकने लगा है। जब भी कोई ऐसी बात सामने आती है तो बाहर वालों से पहले भीतर वालों के विरोध की आवाज सुनाई देने लगती है। गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा, कपिल सिब्बल और पी चिदंबरम जैसे कद्दावर नेता पार्टी की कार्यशैली पर टिप्पणी कर चुके हैं। ऐसे में कांग्रेस को पहले अपना घर ठीक करना होगा। 

राहुल की भूमिका तय करना होगी
कांग्रेस को विपक्ष को यह विश्वास दिलाना होगा कि वे मोर्चे को उसके अंजाम तक पहुंचाने में सक्षम हैं। कांग्रेस पार्टी अपनी रणनीति में बदलाव करे तो ये बहुत मुश्किल भी नहीं है। भले ही भाजपा को आज विश्व की सबसे बड़ी पार्टी कहा जाता है, लेकिन देश के हर हिस्से में कांग्रेस पार्टी का संगठन मौजूद है। सोनिया गांधी को आगे आकर यह बताना होगा कि राहुल गांधी या प्रियंका गांधी वाड्रा, पार्टी में किस हैसियत पर काम करेंगे। वे यह काम जितना जल्दी कर देंगी, विपक्ष को एकजुटता करने में उतनी ही मदद मिलेगी। एक ऐसा नेता तो सामने आ जाएगा, जिसे देखकर विपक्षी दल यह तय सकेंगे कि उन्हें उसका नेतृत्व मंजूर है या नहीं। 
 

भाजपा में भी 'कारीगर' मौजूद

यह बात केवल कांग्रेस पार्टी के लिए ही नहीं है, बल्कि भाजपा में भी बड़े पैमाने पर लाक्षागृह तैयार करने के कारीगर मौजूद हैं। पार्टी की एक राष्ट्रीय विंग का जिम्मा संभाल चुके एक नेता बताते हैं, पश्चिम बंगाल में पार्टी क्यों हारी है, इसका जवाब है किसी के पास। कुल मिलाकर कितने लोग रहे हैं, जिन्होंने बंगाल चुनाव के सारे फैसले किए हैं। 

आरएसएस की कई बातों को दरकिनार कर टीएमसी के विधायकों को धड़ाधड़ भाजपा ज्वाइन करा दी गई। नतीजा सबके सामने है। अब यूपी को लेकर शीर्ष नेता अपनी मनमर्जी कर रहे हैं। योगी कुछ और चाहते हैं तो राष्ट्रीय नेतृत्व की अलग ही चाल है। भाजपा के भीतर अनेक ऐसे नेता मौजूद हैं जो वक्त का इंतजार कर रहे हैं। साल 2022 के फरवरी-मार्च में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब का विधानसभा चुनाव है। गोवा और मणिपुर के चुनाव के अलावा साल के अंत में हिमाचल प्रदेश और गुजरात का नंबर भी आएगा। 

यूपी का चुनाव अगर भाजपा ठीक से नहीं लड़ पाती है तो पार्टी के भीतर से कई आवाजें बाहर आ जाएंगी। कहीं पर शिवराज बोलेंगे तो कहीं वसुंधरा राजे की सुननी पड़ेगी। योगी आदित्यनाथ को लोग देख चुके हैं कि वे भी चुप नहीं बैठेंगे। कर्नाटक में भी पार्टी की उथल-पुथल संभव है। उत्तराखंड व असम में भी कई नेता नाराज बताए जा रहे हैं। केंद्र में भी कई वरिष्ठ मंत्री बोलने के लिए सही वक्त का इंतजार कर रहे हैं। 

विपक्ष को साझा कार्यक्रम बनाना होगा
विपक्ष को सोच समझकर कदम आगे बढ़ाना होगा। उन्हें एक कॉमन प्रोग्राम तय करना है। राजनीतिक जानकारों का कहना है, कहीं ऐसा न हो कि कांग्रेस और भाजपा के लाक्षागृह की आंच विपक्ष को ही न झुलसा दे। संभव है कि आने वाले दिनों में ममता बनर्जी और राकांपा प्रमुख शरद पवार, विपक्षी नेताओं की बैठक बुला सकते हैं। इस बाबत कांग्रेस पार्टी से भी बात की जाएगी। बड़े दलों के नेता जैसे मायावती, अखिलेश यादव, स्टालिन, के. चंद्रशेखर राव, हेमंत सोरेन, तेजस्वी यादव, फारुख अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती, अरविंद केजरीवाल और दूसरे कई नेता बैठक में शामिल हो सकते हैं। 
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यूपी को लेकर विपक्ष की रणनीति पर नजर

यहां यह भी देखने वाली बात होगी कि विपक्ष के नेता यूपी को लेकर कैसी रणनीति बनाते हैं। चूंकि मायावती विपक्ष की बैठक से पहले ही पंजाब में अकाली दल के साथ समझौता कर चुकी हैं। किसानों के मसले पर अकाली दल, एनडीए से अलग हो गया है। शिवसेना का कांग्रेस और एनसीपी के साथ संबंध गठबंधन अब दरकने लगा है। 

राजस्थान कांग्रेस में सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य और जितिन प्रसाद की राह पर चलने को आतुर हैं। ऐसे में वरिष्ठ नेता शरद पवार और ममता बनर्जी के लिए विपक्षी दलों को जोड़ना उतना आसान भी नहीं है। आनंद कुमार बताते हैं, इन दलों को आपस में भरोसा बनाना होगा। ऐसा न हो कि कोई एक दल किसी राज्य में विपक्ष के साथ है तो दूसरे राज्य में उसके खिलाफ है। विपक्षी नेताओं को एक साझा कार्यक्रम तय कर आगे बढ़ना होगा। 
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