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Politics: दिल्ली में गृहमंत्री बोले और पटना में आया सियासी तूफान, विधानसभा भंग करके पलटी मार सकते हैं नीतीश?

सार

Politics: बिहार के मुख्यमंत्री और जद (यू) अध्यक्ष नीतीश कुमार ने शनिवार 20 जनवरी को पार्टी की नई टीम को घोषित किया है। इस टीम में पूर्व अध्यक्ष राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह की टीम के सदस्यों को जगह नहीं मिली है। वशिष्ट नारायण सिंह को उन्होंने उपाध्यक्ष बनाया है।
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अमित शाह और नीतीश कुमार (फाइल फोटो) - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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पटना में चाय के प्याले में तूफान आया हुआ है। खबर है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार विधानसभा भंग करके पलटी मार सकते हैं? सोशल मीडिया में इसे लेकर हलचल मची है। इस सवाल के जवाब में जद (यू) के राष्ट्रीय प्रवक्ता और नीतीश कुमार के राजनीतिक सलाहकार केसी त्यागी का कहना है कि यह खबर या अफवाह भाजपा की फैलाई हुई है। केसी त्यागी का कहना है कि केन्द्रीय मंत्री अमित शाह ने इंटरव्यू दिया था। इसमें उन्होंने कहा था कि प्रस्ताव आने पर विचार किया जाएगा। त्यागी ने कहा कि लोगों को बताना चाहिए कि क्या जद (यू) ने ऐसा कोई प्रस्ताव दिया है, जिस पर अमित शाह विचार करेंगे?

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केसी त्यागी इसके बाद कुछ नहीं बोले। क्योंकि इस तरह की अफवाह या खबर को पहली हवा उन्हीं के बयान ने दे दिया था। जिस दिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पार्टी की कमान अपने हाथ में ले ली, उसी दिन त्यागी ने अपने सदाबहार वाक्य को दोहराया और कहा कि राजनीति में कोई किसी का स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता। पूर्व अध्यक्ष ललन सिंह का इस्तीफा हुआ ही था, लिहाजा संभावनाओं पर मीडिया में खूब खबरें चलीं। हालांकि, पटना में सियासत तेज है और कहा जा रहा है कि नीतीश इतिहास दोहरा सकते हैं।

क्यों उठ रहा है राजनीतिक बवंडर?
अमित शाह का इंटरव्यू आने और विचार करने का संकेत देने के बाद भाजपा ने नीतीश कुमार के खिलाफ अपने बयानों में तल्खी घटा दी। पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने नीतीश कुमार के एनडीए में लौटने की संभावना का स्वागत करना शुरू कर दिया। चिराग पासवान ने भी अपनी भाषा में नीतीश कुमार के प्रति पहले वाली तल्खी नहीं दिखाई। बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी नीतीश कुमार के पुराने साथी हैं। उन्होंने अवसर की नजाकत भांप कर बयान देना शुरू कर दिया। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सम्राट चौधरी के बयान भी राजनीतिक कूटनीति से भरे आने लगे। नीतीश कुमार से गले मिले और फिर छिटकने वाले उपेन्द्र कुशवाहा ने भी कहा कि नीतीश कुमार राजद के नेताओं के व्यवहार से तंग हैं। इन बयानों के बीच मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राबड़ी आवास पर पीछे के गेट से गए। राजद प्रमुख ने उन्हें दही चिवड़ा का तिलक नहीं लगाया। अमित शाह के बयान पर चर्चा के बाद लालू प्रसाद यादव और उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव मुख्यमंत्री से मिलने न केवल उनके आवास पर गए, बल्कि देर तक चर्चा की।

20 जनवरी का घटनाक्रम भी अहम
बिहार के मुख्यमंत्री और जद (यू) अध्यक्ष नीतीश कुमार ने शनिवार 20 जनवरी को पार्टी की नई टीम को घोषित किया है। इस टीम में पूर्व अध्यक्ष राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह की टीम के सदस्यों को जगह नहीं मिली है। वशिष्ट नारायण सिंह को उन्होंने उपाध्यक्ष बनाया है। केसी त्यागी राष्ट्रीय प्रवक्ता के साथ-साथ नीतीश कुमार के राजनीतिक सलाहकार हो गए हैं। अपनी नई टीम घोषणा से पहले नीतीश कुमार ने पार्टी के सांसदों, विधायकों, नेताओं को तीन दिन पहले ही पटना न छोड़ने के लिए कहा था। यह पूरे घटनाक्रम आपस में काफी जुड़ रहे हैं। मसलन ललन सिंह का अध्यक्ष पद छोड़ना। इस्तीफा देना। नीतीश कुमार का पार्टी प्रमुख का पद हासिल करना। इसके पीछे की वजह को मीडिया ने ललन सिंह का लालू के साथ मिलकर नीतीश के साथ विश्वासघात करने की रणनीति में शामिल होना बताया है। अब इसका पटाक्षेप कैसे होगा, यह तो केवल समय बताएगा। वास्तविकता केवल इतनी है कि 'इंडिया' गठबंधन की बैठक में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जद (यू) अध्यक्ष की हैसियत से शामिल हुए थे। गठबंधन के संयोजक का पद ठुकराया था। सीटों के बंटवारे को जल्द अंतिम रूप देने का सुझाव दिया था और विपक्षी एकता के मंत्र पर आए थे। लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव ने भी अभी गठबंधन में सब कुछ ठीक ठाक होने का ही संकेत दिया है।

क्या नीतीश फिर बनेंगे पलटी कुमार?
नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव सब बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर के अनुयायी हैं। नीतीश कुमार के वह राजनीतिक गुरू थे। कर्पूरी ठाकुर की तरह ही नीतीश कुमार अपनी छवि को बेदाग रखने के लिए कोई भी कदम उठा लेते हैं। अच्छे प्रशासक, जन नेता हैं। बिहार में नीतीश कुमार ने सुशासन बाबू के तौर पर अपनी साख बनाने में सफलता पाई थी। कर्पूरी ठाकुर का मानना था कि जनहित के लिए सत्ता में आने के लिए दलों के साथ समझौता किया जा सकता है। नीतीश कुमार की राजनीतिक यात्रा में इसके लक्षण दिखे हैं। वह भाजपा के सहयोग से 2005 में मुख्यमंत्री बने थे। 2015 में राजद के साथ हाथ मिलाया, एनडीए छोड़े और मुख्यमंत्री बने। फिर महागठबंधन छोड़ा, एनडीए के साथ गए। पिछले साल फिर एनडीए छोड़ा, राजद और कांग्रेस के साथ पाले में खड़े होकर मुख्यमंत्री बने हैं। आठ बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं। एक करिश्मा और किया था। 2014 के लोकसभा चुनाव में खराब प्रदर्शन की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बना दिया। मांझी को जल्द ही हटाकर फिर मुख्यमंत्री बन गए।

प्रशांत किशोर कहते हैं कि नीतीश कुमार चाहे जिसके साथ जाएं या रहें, उनकी राजनीति का अंतिम चरण चल रहा है। तीन महीने पहले तक केसी त्यागी कहते थे कि चाहे मरें या खपें, रहना अब विपक्षी दल के खेमे में है। आखिर राजनीति में क्रेडिबिलिटी (साख) भी कोई चीज है? शिवानंद तिवारी ने पिछले साल फोन वार्ता में कहा था कि आखिर नीतीश कुमार कितनी बार राजनीति का कपड़ा बदलेंगे। यह तो भाजपा वाले हैं जो देश की जनता और बिहार को अफवाह फैलाकर भ्रमित करते रहते हैं।

अमित शाह के इस बयान का मतलब क्या है
नरेन्द्र मोदी सरकार ने पहले कार्यकाल का चार वर्ष पूरा किया था। अमित शाह भाजपा अध्यक्ष थे। नीतीश कुमार एनडीए में थे। सीटों की रार-तकरार चल रही थी। खाने की टेबल पर अमित शाह ने कहा कि यह राजनीति है। उन्हें (नीतीश कुमार) कुछ दिखा तो हमारे साथ लौटकर आए। उन्हें (नीतीश कुमार) जहां ठीक लगेगा, उन्हें तय करना है। कांग्रेस के पूर्व महासचिव और राजनीतिक रणनीतिकार में गिने जाने वाले जनार्दन द्विवेदी की 2015 के चुनाव नतीजे आने के बाद नाश्ते के टेबल पर बोली गई लाइन महत्वपूर्ण है। जर्नादन ने कहा था कि गड़बड़ तब होगी जब नीतीश की आंत में लालू प्रसाद के दांत चुभेंगे। द्विवेदी की आशंका नीतीश कुमार के मामले में स्पष्ट दिखाई दी। जो आंत में दांत की तरह जब चुभा, नीतीश उसे छोड़ गए। भाजपा के नेता कहते हैं नीतीश कुमार राजद के नेताओं के व्यवहार से दु:खी हैं। जद (यू) के कुछ नेता भी भाजपा के साथ बने रहने को एक दृष्टि से बेहतर मानते हैं। उनका मानना है कि भाजपा के साथ रहने पर 2019 के लोकसभा चुनाव में जद (यू) की 17 में से 16 सीटें आई थी। हालांकि 2020 के विधानसभा चुनाव में तीसरी पार्टी बनने के सवाल पर वह चुप लगा जाते हैं।
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'भाजपा एक वादा करे तो क्या पता नीतीश फिर बन जाएं पलटी कुमार'
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को विधानसभा चुनाव के बाद से पार्टी का तीसरे नंबर पर आना अखर रहा है। पहले नंबर की पार्टी राजद बन गई, दूसरे नंबर की भाजपा। जबकि दूसरे नंबर की पार्टी जद(यू) या राजद रहती थी। नीतीश कुमार इसी कलंक को धोना चाहते हैं। 2020 के विधानसभा चुनाव में तेजस्वी यादव की सूझबूझ, आक्रामक शैली और वरिष्ठ नेताओं के तालमेल ने राजद में जान डाल दी है। जानकार मानते हैं कि फिलहाल नीतीश कुमार की योजना किसी भी सूरत में पार्टी को अपने पुराने आभामंडल में ले जाने की है। नीतीश कुमार ने पिछले कुछ महीने में पार्टी के जनाधार को मजबूत बनाने, सरकार की साख को बनाने और बिहार के हित में बड़े फैसले किए हैं। शिक्षकों की भर्ती आदि की है। जद(यू) के साथ अपने चेहरे को धार दी है। वह राजद के मंत्रियों, विधायकों के मनमाने पन को दबाव बनाकर नियंत्रित करते नजर आए हैं। वह चाहते हैं कि लोकसभा चुनाव 2024 के साथ विधानसभा का चुनाव हो जाए। इसमें जद(यू) 125 सीटों पर लडऩे का अवसर मिले। उन्हें लोकसभा चुनाव में 2019 के चुनाव की ही तरह महत्व मिले। राजनीति के पंडित कहते हैं कि यह सब शर्तें भाजपा के लिए मान लेना भी आसान नहीं है। खेमें में बिहार के दलों की भी संख्या बढ़ी है। दावेदार भी बढ़े हैं और भाजपा लक्ष्य भी बड़ा लेकर चल रही है।
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