पश्चिम बंगाल में टीएमसी वाला लड़ रहा है टीएमसी के खिलाफ चुनाव
बंगाल में टीएमसी के खिलाफ टीएमसी वाला ही चुनाव लड़ रहा है। चाहे वह मुकुल राय हों या अर्जुन सिंह, जितेन्द्र तिवारी या फिर शुभेंदु अधिकारी और अन्य। ऐसे में क्या बताएं कि कौन जीतेगा और कौन हारेगा? भाजपा के पश्चिम बंगाल उपाध्यक्ष को पार्टी के ये फैसले खाए जा रहे हैं। उम्मीद थी कि उन्हें टिकट मिलेगा। ये भी उम्मीद थी कि पूर्व राज्यपाल तथागत राय, पंकज राय, मोहित, ईश्वर प्रिय राय चौधरी, प्रताप बनर्जी, अमितव राय, रितेश तिवारी, जेपी मजूमदार जैसे तमाम भाजपा नेताओं को तो टिकट मिलेगा। टिकट मिलेगा तो जीतेंगे भी और सरकार बनने पर मंत्री भी बनेंगे। लेकिन हो गया उल्टा। बताते हैं, कई सांसद चुनाव में उतारे गए। लेकिन दिलीप घोष को टिकट न देकर पार्टी ने उनके मुख्यमंत्री बनने के सपने पर पानी फेर दिया है। भाजपा के राज्यसभा सांसद स्वप्नदास गुप्ता मैदान में उतरे भी तो तारकेश्वर जैसी सबसे कमजोर सीट मिली। वहीं मुकुल राय को डंके की चोट पर जीतने वाली सीट मिल गई। शुभेंदु मंच से बोल रहे हैं कि वह पश्चिम बंगाल को चलाएंगे तो अब वह इस पर क्या बोलें। सूत्र का कहना है कि नई भाजपा है। चुप रहने में ही भलाई है। देखिए न अब तो आडवाणी और जोशी भी नहीं बोलते। सब चुप हैं।
विधानसभा चुनाव के बाद क्या संभल जाएगा राहुल गांधी का करियर?
राज्यों के चुनाव में कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी का पूरा राजनीतिक करियर दांव पर है। उन्हें परोक्ष रूप से जहां कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का समर्थन हासिल है, वहीं बहन और पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने स्थिति को भांपकर मजबूती के साथ पीछे खड़े होने का फैसला किया है। अब कांग्रेस की राहुल ब्रिगेड थोड़ा मुस्करा रही है। इस मुस्कराहट की तीन बड़े कारण हैं। पहली वजह, असम विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का तेजी से लड़ाई में लौटना है। जमीनी स्तर पर ऐसे संकेतों को देखकर राहुल गांधी सीएए विरोधी 'गमोसा' डाले राज्य की जनता से खुलकर पांच वादे कर रहे हैं। बताते हैं कि बाहर से भाजपा ने भले ही मनोवैज्ञानिक दबाव बना रखा है, लेकिन अंदरखाने उसकी नींद उड़ी है।
दूसरी, बड़ी वजह पश्चिम बंगाल है। यहां कांग्रेस ने अपने लोकसभा में नेता अधीर रंजन चौधरी के प्रचार के सहारे पूरी पार्टी और गठबंधन को छोड़ दिया है। बताते हैं, इस फैसले से भाजपा को झटका लग रहा है और त्रिकोणीय मुकाबले जैसी स्थिति न आ पाने के कारण उसके (भाजपा) रणनीतिकार परेशान हैं। वहीं वामदल भी इसे लेकर खास एतराज नहीं कर रहे हैं। तीसरा खेल पुडुचेरी में चल रहा है।
तमिलनाडु में डीएमके और उसके नेता स्टालिन के पीछे जनसमर्थन देखकर कांग्रेसियों की उम्मीदें बढ़ रही हैं। टीम राहुल को लग रहा है कि कदाचित भाजपा राजनीतिक लड़ाई में ठहरी तो भैया (राहुल) की राजनीति छलांग लगाने लगेगी। क्योंकि वैसे भी राज्यों के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने भले स्टार प्रचारकों की लंबी-चौड़ी सूची जारी कर दी, लेकिन दारोमदार तो राहुल-प्रियंका पर ही है। अब देखना है कि आगे क्या होता है।
महाराष्ट्र में घाटा या मुनाफा दोनों शिवसेना-एनसीपी का
सुशील कुमार शिंदे के पास लंबा राजनीतिक अ्नुभव है। पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण और अशोक चव्हाण फूंक-फूंककर कदम रख रहे हैं। महाराष्ट्र में भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आए नाना पटोले के पास बड़ी जिम्मेदारी है। अपने नेताओं पर भरोसा करके कांग्रेस महाराष्ट्र में खामोशी से सब देख रही है। राज्य सरकार में शिवसेना और एनसीपी के साथ भागीदार कांग्रेस का यह रुख मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को भी परेशान कर रहा है। कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि राज्य में सरकार का गठन शरद पवार की पहल पर हुआ है। शिवसेना और उद्धव ठाकरे दोनों ने पवार पर ही अधिक भरोसा भी किया है। अब ऐसे में पवार चाहें केन्द्रीय मंत्री अमित शाह से मिलें या जो भी करें उसका नुकसान भी एनसीपी और शिवसेना को ही झेलना है। कांग्रेस का क्या? वह तो तटस्थ है। इसलिए उम्मीद है कि पवार जो भी करेंगे, सब सोच समझकर ही करेंगे।
'सिंह इज किंग' की भूमिका में उभरे पंजाब के कैप्टन
पंजाब के कैप्टन अमरिंदर सिंह ने अपनी लोकप्रियता में जोरदार इजाफा किया है। पार्टी के भीतर भी कैप्टन का शत्रु दमन योग चल रहा है। कांग्रेस के नेता नवजोत सिंह सिद्धू को जहां कैप्टन के आगे अच्छे रिश्ते का संकेत देना पड़ा, वहीं पोती की शादी में नेशनल कांफ्रेस के डा. फारुख अब्दुल्ला के साथ डांस ने भी कैप्टन की इमेज निखार दी है। असल में कैप्टन ने एक ही बाजी से सभी को चित कर दिया है। किसान आंदोलन में कैप्टन की भूमिका ने पंजाब में जहां भाजपा, अकाली दल को आईसीयू में धकेल दिया है, वहीं हरियाणा में भी सत्ताधारी दल को चिंता सताने लगी है। किसान आंदोलन ने जहां पूरे देश में भाजपा के खिलाफ माहौल को खड़ा कर दिया, वहीं इससे कैप्टन की लोकप्रियता में भारी बढ़ोत्तरी हो गई है। वह सोशल मीडिया से लेकर हर जगह सर्च भी किए जा रहे हैं।
नंदीग्राम में ममता का आखिरी दांव
नंदीग्राम विधानसभा सीट के दो हिस्से हैं। एक हिस्से में बड़ी आबादी मुसलमान मतदाताओं की है। तीस फीसदी से ज्यादा। दूसरे भाग में हिन्दुओं की आबादी ज्यादा है। भाजपा प्रत्याशी शुभेंदु अधिकारी को उम्मीद थी कि सूफियाना शेख और ताहेर युसुफ के प्रभाव वाली आबादी को छोड़कर शेष कुछ मुसलमानों का कुछ वोट मिलेगा, लेकिन वह इस पूरे क्षेत्र में प्रचार के लिए घुस ही नहीं पाए। हिंदु बहुल इलाकों में शुभेन्दु, भाजपा और संघ तीनों ने मिलकर हिन्दुत्व की पूरी ताकत झोंक दी। धन-बल का भी खूब इस्तेमाल हुआ।
बदले में ममता बनर्जी को भी नंदीग्राम की हवा भांपते देर नहीं लगी। उन्होंने शेख और ताहे पर नंदीग्राम को छोड़कर खुद हिन्दुओं की आबादी वाले दूसरे हिस्से के नंदीग्राम पर केन्द्रित कर लिया। पार्टी के एक नेता की सलाह पर ममता पूरी तरह से सॉफ्ट हिन्दुत्व का कार्ड खेलने उतर गईं। मंच पर पूजा-पाठ से लेकर पार्टी का गोत्र बताते-बताते अपना भी शांडिल्य गोत्र बता डाला। ममता को उम्मीद है कि मतदान में आधा हिन्दू वोट जरूर मिलेगा, अल्पसंख्यक जिता देगा। अब उनकी पार्टी के बड़े नेता पार्थ चटर्जी कहते हैं कि इस पर भी ममता नहीं जीती तो आखिर कब जीतेंगी? बस आप चुनाव के बाद शुभेंदु की हालत देखिएगा।