वकीलों के एक संगठन ऑल इंडिया ज्यूरिस्ट्स एसोसिएशन और पत्रकार स्पर्श उपाध्याय की ओर से दायर इस याचिका को उत्तराखंड हाईकोर्ट की ओर से जारी 16 अगस्त की अधिसूचना को चुनौती दी गई है। इस अधिसूचना में कहा गया है कि न्यायालय 24 अगस्त, 2021 से केवल फिजिकल मोड के माध्यम से न्यायिक कार्य फिर से शुरू करेगा और वर्चुअल सुनवाई के किसी भी अनुरोध पर विचार नहीं किया जाएगा।
इस याचिका में विशेष रूप से उत्तराखंड हाईकोर्ट के 24 अगस्त से पूरी तरीके से फिजिकल मोड में लौटने के फैसले को चुनौती दी गई है। याचिका में उत्तराखंड हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने के अलावा सभी हाईकोर्ट को यह निर्देश देने की मांग की गई है कि वे वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से वकीलों को सुनवाई में हिस्सा लेने पर रोक न लगाएं।
याचिका में मांग की गई है कि वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से वर्चुअल माध्यम से अदालत की कार्यवाही में भाग लेने का अधिकार संविधान का अनुच्छेद 19(1)(ए) और (जी) के तहत एक मौलिक अधिकार है। याचिका में कहा गया है कि उत्तराखंड हाईकोर्ट की 16 अगस्त की अधिसूचना वर्चुअल अदालत के आइडिया के लिए एक मौत की घंटी है। वर्चुअल सुनवाई, न्याय पाने का सुलभ व सस्ता माध्यम है, ऐसा सुप्रीम कोर्ट की ई-समिति ने कहा था।
उत्तराखंड के अलावा याचिकाकर्ता ने बॉम्बे, मध्य प्रदेश और केरल हाईकोर्ट का भी हवाला दिया है जहां वकीलों को शारीरिक रूप से पेश होने के लिए मजबूर किया गया है। याचिका में कहा गया है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ए) और (जी) के तहत सूचना, संचार और प्रौद्योगिकी का उपयोग करके वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से वर्चुअल अदालतें और मुकदमों का संचालन करना एक मौलिक अधिकार है।