विशेषज्ञों का मानना है कि राज्य सरकार के इस कदम से गुजरात में अन्य राज्यों से आकर बसे हजारों युवाओं के ऊपर प्रभाव पड़ेगा। इनमें खासतौर पर यूपी-बिहार जैसे हिंदीभाषी राज्यों से वहां जाकर बसने वाले लोग सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। राज्य में हिंदी भाषी लोगों के शीर्ष संगठन उत्तर भारतीय विकास परिषद ने इस निर्णय को चुनौती देने का निर्णय लिया है।
परिषद के अध्यक्ष महेश सिंह कुशवाहा ने कहा कि यह गुजरात में चार दशक से भी ज्यादा समय से रहने वालों के साथ अन्याय है। उन्होंने कहा, 41 साल बेहद लंबा समय होता है। इस दौरान 1978 से पहले आए अधिकतर लोग मर चुके हैं। जो यहां आकर 20, 30 या 40 साल पहले स्थायी रूप से बस गए हैं, उनका क्या होगा? यह नियम लागू ही करना था तो 10 साल की सीमा बांधी जाती।