'राज्य में इस तरह की स्थिति पूरी तरह से अनुचित'
न्यायमूर्ति जी.एस.कुलकर्णी और न्यायमूर्ति जितेंद्र जैन की खंडपीठ ने मंगलवार को कहा कि राज्य में इस तरह की स्थिति पूरी तरह से अनुचित है। खंडपीठ जयराम मोरे नाम के व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। मोरे ने 1983 से मई 2021 तक पुणे के सावित्रीबाई फुले विश्वविद्यालय में 'हमाल' (कुली) के रूप में काम किया था। उन्होंने अदालत से सरकार को उनकी पेंशन राशि जारी करने का निर्देश देने की मांग की थी।
याचिका में क्या कहा गया था
उच्च न्यायालय ने इस बात पर गौर किया कि जयराम मोरे ने अपने कार्यकाल के दौरान बेदाग सेवा दी, बावजूद इसके उन्हें तकनीकी आधार पर पेंशन की राशि का भुगतान नहीं किया गया। मोरे ने अपनी याचिका में दावा किया कि विश्वविद्यालय द्वारा संबंधित विभाग को सभी जरूरी दस्तावेजों को जमा कराने के बावजूद पेंशन का भुगतान नहीं किया जा रहा है।
'क्या सेवानिवृत्त कर्मचारी को ऐसी दुर्दशा का सामना करना चाहिए'
पीठ ने कहा, कार्यवाही की शुरुआत से ही हम सोच रहे थे कि कोई व्यक्ति तीस वर्षों की लंबी बेदाग सेवा देने के बाद सेवानिवृत्त होता है, तो क्या उसे ऐसी दुर्दशा का सामना करना चाहिए और पेंशन के बुनियादी अधिकार से वंचित होना चाहिए, जो उसकी आजीविका का बड़ा स्रोत है।
चार दशक पुराने फैसले का दिया हवाला
उच्च न्यायालय ने पेंशन को लेकर चार दशक पुराने एक आदेश का हवाला दिया और कहा, इस तरह के एक फैसले में उच्चतम न्यायालय ने फैसला सुनाया था कि पेंशन एक अधिकार है और इसका भुगतान सरकार के विवेक पर निर्भर नहीं करता है और इसे नियमों के तहत लागू किया जाएगा।
अदालत में बड़ी संख्या में आ रहे ऐसे मामले
पीठ ने इस बात पर भी गौर किया कि इस अदालत में बड़ी संख्या में ऐसे मामले आ रहे हैं, जिनमें लोग अपनी पेंशन राशि का भुगतान करने की मांग कर रहे हैं। अदालत ने कहा, ऐसा प्रतीत होता है कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश और उसकी वास्तविक भावना को भुला दिया गया है।