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Pegasus: क्या है ये स्पाईवेयर जिस पर सुप्रीम कोर्ट को जवाब नहीं दे पाया केंद्र, राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला बताने के बावजूद जांच क्यों होगी?

Wed, 27 Oct 2021 03:16 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Pegasus Snooping Row: अमर उजाला डॉट कॉम आपको पांच पॉइंट्स में बता रहा है कि पेगासस केस क्या है, इसका इस्तेमाल कैसे होता है, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर संज्ञान क्यों लिया था और कोर्ट के फैसले की वजह क्या रही? 
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पेगासस केस में सुप्रीम कोर्ट का आदेश आया। - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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Pegasus Snooping Row: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को पेगासस मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय विशेषज्ञ समिति के गठन का फैसला सुनाया। इस मामले में कई तकनीकी पेंच होने की वजह से शीर्ष अदालत ने कहा कि उसके पास प्रथम दृष्टया याचिकाकर्ता की दलीलों को स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। दरअसल, पेगासस मामले में अब तक कई तथ्य अस्पष्ट हैं। इसके अलावा केंद्र सरकार की तरफ से भी इसे सिर्फ राष्ट्रीय सुरक्षा का मसला बताकर ज्यादा जानकारी देने से इनकार कर दिया गया। 
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ऐसे में अमर उजाला आपको पांच पॉइंट्स में बता रहा है कि...

1. पेगासस स्पाईवेयर क्या है? 
2. इसका इस्तेमाल कैसे होता है?
3. भारत में इसके निशाने पर किन लोगों के होने की आशंका?
4. सुप्रीम कोर्ट ने क्यों लिया इस मामले का संज्ञान? 
5. सर्वोच्च न्यायालय में क्या रही सरकार की दलील और कोर्ट के फैसले की वजह?

1. पेगासस स्पाईवेयर क्या है?

जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, स्पाईवेयर वो सॉफ्टवेयर या प्रोग्राम होते हैं, जिनका इस्तेमाल जासूसी से जुड़े कामों के लिए होता है। पेगासस स्पाईवेयर को इजराइल के एनएसओ ग्रुप ने तैयार किया है। इसे मुख्य तौर पर एक खुफिया साइबर प्रोग्राम के तौर पर तैयार किया गया था, जिससे दुनियाभर की जासूसी एजेंसियों को गुपचुप तरीके से लगभग हर स्मार्टफोन से डेटा निकालने में मदद मिले। बताया जाता है कि यह सॉफ्टवेयर इजराइली खुफिया विभाग के कुछ पूर्व जासूसों ने तैयार किया था। 

2. कैसे होता है पेगासस का इस्तेमाल?

पेगासस की जद में आने वाले डिवाइसों की लिस्ट में लगभग सभी डिवाइस आते हैं। हालांकि, इस स्पाईवेयर का ज्यादा इस्तेमाल एपल के सिक्योरिटी सिस्टम को तोड़ने के लिए होता है। दरअसल, निजी जानकारी की सुरक्षा के मामले में एपल को सबसे बेहतर माना गया है। ऐसे में पेगासस को एपल की आईमैसेज (iMessage) एप और पुश नोटिफिकेशन सर्विस (PSN) प्रोटोकॉल को तोड़कर जानकारी चुराने के लिए जाना जाता है। यह स्पाईवेयर आईफोन में डाउनलोड होने वाली किसी एप्लीकेशन की नकल कर सकता है और एपल के सर्वर्स के जरिए मिलने वाले पुश नोटिफिकेशन से भी फोन को शिकार बना सकता है। 

चौंकाने वाली बात यह है कि किसी भी डिवाइस की जानकारी चुराने के लिए पेगासस स्पाईवेयर का किसी फोन में होना जरूरी नहीं है, बल्कि हैकर को सिर्फ निशाना बनाए जाने वाले फोन का नंबर पता होना चाहिए। इससे स्पाईवेयर का सिस्टम अपने आप ही टारगेट के नेटवर्क में घुस जाता है और उसे निशाना बना लेता है। हालांकि, यह सिस्टम हमेशा सफल नहीं होता, क्योंकि कई ऑपरेटिंग सिस्टम अपडेट होने के बाद सिक्योरिटी प्रोटोकॉल को अपडेट कर लेते हैं। हालांकि, पेगासस के निशाने में आए सेलफोन को बचाने का एक तरीका टारगेट हुए फोन के डिफॉल्ट ब्राउजर को बदलना है।  

3. भारत में किन लोगों के पेगासस के निशाने पर होने की आशंका?

फ्रांस की गैर-लाभकारी मीडिया संस्था फॉरबिडेन स्टोरीज ने पेगासस स्पाईवेयर के निशाने पर आए करीब 50 हजार मोबाइल नंबरों की जो एक लिस्ट लीक की थी, उसमें करीब 1500 की ही पहचान हो पाई। यह लिस्ट पहली बार 18 जुलाई को सामने आई थी, जिसमें 161 भारतीयों के भी नाम थे। जो नाम सामने आए थे, उनमें कई राष्ट्राध्यक्ष, राजनीति से जुड़े लोग, कार्यकर्ता, छात्र, वकील और पत्रकार शामिल थे। हालांकि, एनएसओ ग्रुप लगातार यह करता रहा था कि उसने यह स्पाईवेयर सिर्फ देश की सरकारों को दिए थे और लीक हुई लिस्ट में जिन लोगों के नाम हैं, जरूरी नहीं कि उनके मोबाइल को हैक किया ही गया हो। 

राजनीतिक चेहरे

भारत में जिन राजनीतिक चेहरों के इस स्पाईवेयर के निशाने पर आने की आशंका जताई गई, उनमें राहुल गांधी, राजनीतिक सलाहकार प्रशांत किशोर, ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी, केंद्र सरकार में मंत्री प्रह्लाद सिंह पटेल, आईएएस अफसर रह चुके अश्विनी वैष्णव (मौजूदा रेल और आईटी मंत्री), विश्व हिंदू परिषद के प्रवीण तोगड़िया समेत 14 नाम थे। 

संवैधानिक अधिकारी, कार्यकर्ता

इसके अलावा लिस्ट में जिन संवैधानिक अधिकारियों और कार्यकर्ताओं के नाम थे, उनमें चुनाव आयोग के पूर्व आयुक्त अशोक लवासा का नाम भी था। इसके अलावा सीबीआई प्रमुख रहे आलोक वर्मा, राकेश अस्थाना और एक अधिकारी राकेश शर्मा का नाम भी इस लिस्ट में पाया गया था। कार्यकर्ताओं और एकेडमिक्स से जुड़े लोगों में रोना विल्सन, आनंद तेलतुंबड़े, शोमा सेन और गौतम नवलखा समेत 40 नाम लिस्ट में थे। बिजनेसमैन में अनिल अंबानी सबसे बड़ा नाम थे। इसके अलावा दलाई लामा के कई अनुयायियों पर भी पेगासस की ओर से जासूसी की आशंका थी। 

पत्रकार

भारत में जिन पत्रकारों के इस स्पाईवेयर के टारगेट होने की आशंका जताई गई, उनमें द वायर के एमके वेणु और सिद्धार्थ वरदराजन, इंडियन एक्सप्रेस के पूर्व पत्रकार सुशांत सिंह, हिंदुस्तान टाइम्स के शिशिर गुप्ता, हिंदू की पत्रकार विजेता सिंह समेत 29 नाम थे। 

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों लिया इस मामले का संज्ञान? 

सरकार का शुरुआत से ही कहना है कि जासूसी कांड में जांच के लायक कुछ भी नहीं है। विपक्ष की तरफ से संसद में इस मुद्दे को बार-बार उठाए जाने के बावजूद सरकार मामले में स्पष्ट जवाब देने या जांच की बात से इनकार ही करती रही। आखिरकार पूरा मानसून सत्र हंगामे की भेंट चढ़ गया। इस बीच पेगासस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दायर हुईं, जिनमें मामले की जांच की मांग की गई। जिन लोगों ने याचिका दायर की, उनमें सीरियल पिटिशनर एमएल शर्मा, परनजॉय गुहा ठकुरता प्रेम शंकर झा और एन राम जैसे पत्रकार शामिल रहे। इसके चलते कोर्ट ने सभी याचिकाओं को साथ लेकर इन पर सुनवाई मंजूर कर ली। पहली बार इस मामले की सुनवाई 5 अगस्त को हुई थी। 

सर्वोच्च न्यायालय में क्या रही सरकार की दलील और कोर्ट के फैसले की वजह?

कुछ और सुनवाइयों के बाद केंद्र सरकार ने 16 अगस्त को एक सीमित एफिडेविट दाखिल किया, जिसमें कहा गया कि पेगासस से जुड़े आरोप सिर्फ आशंकाओं और बिना जांच वाली मीडिया रिपोर्ट्स पर ही आधारित हैं। हालांकि, सरकार ने एक एक्सपर्ट कमेटी के गठन की बात कही थी, जो कि पेगासस जासूसी कांड पर चलाए जा रहे गलत नैरेटिव को खत्म करने का काम करती। 

हालांकि, जब सुप्रीम कोर्ट केंद्र के इस जवाब से संतुष्ट नहीं हुआ और सरकार से ज्यादा जानकारी मुहैया कराने की मांग की, तो सरकार ने तर्क दिया कि पेगासस के इस्तेमाल पर वह ज्यादा जानकारी नहीं दे सकती, क्योंकि यह मामला राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है। इस पर कोर्ट ने मौखिक तौर पर कहा था कि वह सरकार को सुरक्षा पर ज्यादा जानकारी देने के लिए मजबूर नहीं कर सकती, लेकिन वह सिर्फ यह जानना चाहते हैं कि क्या लोगों के फोन हैक हुए थे। कोर्ट ने सरकार का पक्ष पेश कर रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को याद दिलाया कि सरकार ने खुद ही 2019 में माना था कि पेगासस स्पाईवेयर से कुछ व्हाट्सएप यूजर्स प्रभावित हुए हैं। 

सुप्रीम कोर्ट की इन टिप्पणियों के बावजूद जब केंद्र ने विस्तृत जवाब नहीं दाखिल किया, तो चीफ जस्टिस एनवी रमन्ना ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि वे मामले की जांच के लिए एक्सपर्ट कमेटी के गठन पर विचार कर रहे हैं। आखिरकार जब केंद्र सरकार ने आगे कोई भी जानकारी नहीं दी। तो सुप्रीम कोर्ट ने 13 सितंबर को अपना अंतरिम फैसला सुरक्षित रख लिया। लेकिन कोर्ट ने इस दौरान सरकार को फिर से सोचने का मौका दिया। कोर्ट ने 23 सितंबर को ही इस केस से जुड़े एक वकील से कहा था कि वह अगले हफ्ते मामले की जांच के लिए तकनीकी कमेटी के गठन का आदेश जारी करेगी। 
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क्यों हुई सुप्रीम कोर्ट के आदेश में देरी?

इस बीच सर्वोच्च न्यायालय की तरफ से यह आदेश आने में देरी भी हुई। खुद सीजेआई रमन्ना ने बताया था कि कई एक्सपर्ट्स ने निजी कारणों से इस कमेटी का हिस्सा बनने से इनकार कर दिया था। इसलिए आदेश में देरी हुई। अब 27 अक्तूबर को आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने एक कमेटी के गठन की बात कही है, जो कि इस मामले के तकनीकी पहलुओं की जांच करेगी।
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