जब प्रजजन दर घट रही तो क्या जनसंख्या नियंत्रण कानून लाने की कोई जरूरत है?
एआर नंदा कहते हैं कि देश के ज्यादतर राज्यों में टोटल फर्टिलिटी रेट यानी TFR 2.1 या उससे कम हो चुका है। जो यूएन के मुताबिक किसी भी आबादी के रिप्लेसमेंट पॉपुलेशन का स्टैंडर्ड है। यानी हमारे देश की जनसंख्या वृद्धि की दर सही दिशा में जा रही है। उत्तर प्रदेश, बिहार, जैसे कुछ ही राज्य हैं, जहां TFR 2.1 से ज्यादा है। लेकिन, इन राज्यों में भी TFR तेजी से कम हो रहा है। आने वाले तीन से चार साल में यहां भी TFR 2.1 तक पहुंच जाएगा।
एआर नंदा कहते हैं कि एक या दो बच्चों के लिए कानून बनाने की कोई जरूरत नहीं है। ऐसा करने से कन्या भ्रूण हत्या जैसे मामले बढ़ेंगे। नंदा कहते हैं कि चीन जहां सबसे पहले जनसंख्या नियंत्रण जैसा कानून लागू हुआ उसे इसका बहुत नुकसान हुआ। खासतौर कन्या भ्रूण हत्या में बहुत इजाफा हुआ। इस कानून से हो रहे नुकसान की वजह से चीन को पहले एक से दो अब दो से तीन बच्चों की छूट देनी पड़ी।
वहीं, भारत में ओडिशा जैसा राज्य जहां इस तरह का कानून सबसे करीब 28 साल से लागू है। वहां, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को इससे नुकसान हुआ है। ये लोग राज्य की पंचायत राज व्यवस्था की चुनाव प्रक्रिया से भी दूर हो गए। वहीं जिन राज्यों में ये पॉलिसी लागू की गई है, वहां इसके असर को लेकर कभी कोई रिपोर्ट नहीं जारी की गई।
2006 में पूर्व IAS ऑफिसर निर्मला बुच ने इस पॉलिसी को लागू करने वाले पांच राज्यों पर स्टडी की थी। इस स्टडी में बताया गया कि दो बच्चों का नियम आने के बाद इन राज्यो में सेक्स-सिलेक्टिव और अनसेफ अबॉर्शन बढ़े हैं। कुछ मामलों में पुरुषों ने लोकल बॉडी इलेक्शन लड़ने के लिए पत्नी को तलाक दे दिया। इसके साथ ही कुछ मामलों में अयोग्यता से बचने के लिए बच्चों को गोद दे दिया गया।
बेटा पैदा होने की चाह में ज्यादा बच्चे होने की बात होती है उसका क्या?
बेटे की चाह में ज्यादा बच्चे पैदा करने के चलन में भी कमी आई है। ताजा सर्वे बताता है कि 65 फीसदी महिलाएं जिनके दो बेटियां है वो बेटे की चाह में तीसरा बच्चा नहीं करना चाहती हैं।

गांवों के मुकाबले शहरों में प्रजनन दर कैसी है?
गांवों के मुकाबले शहरों में प्रजनन दर काफी कम हो गई है। शहरों में ये घटकर 1.6 हो गई है। वहीं, गांवों में ये आंकड़ा 2.1 पर है। यानी, गांवों में भी प्रजनन दर प्रतिस्थापन के स्तर पर आ चुकी है। कुल प्रजनन दर 2 हो गई है। जो पिछली बार के 2.2 से भी कम है। शहर हो या गांव हर सर्वे में TFR लगातार कम हो रही है। 1992-93 में हुए पहले सर्वे NFHS-1 में गांवों में कुल प्रजनन दर 3.7 शहरों में ये 2.7 थी। 1992-93 में कुल TFR 3.4 था।