लोकसभा में सोमवार को विपत्री दलों ने आपराधिक प्रक्रिया पहचान विधेयक के प्रावधानों को कठोर बताया और इसके दुरुपयोग को रोकने किए मजबूत सुरक्षा मानक सुनिश्चित करने के लिए विधेयक को संसद की स्थायी समिति के पास भेजने की मांग की।
विधेयक पर चर्चा के दौरान सदस्यों ने मसौदा विधेयक में विस्तृत प्रावधानों को लेकर चिंता व्यक्ति की जो किसी पुलिस थाने के हेड कॉन्स्टेबल या जेल के मुख्य वार्डन को दोषियों के साथ-साथ निवारक हिरासत में मौजूद लोगों का माप लेने का अधिकार देता है।
कांग्रेस सदस्य मनीष तिमारी ने विधेयक पर चर्चा की शुरुआत करते हुए कहा कि मसौदा विधेयक कठोर है और नागरिक स्वतंत्रताओं के खिलाफ है। तिवारी ने कहा कि विधेयक मानवाधिकारों और नागरिक स्वतंत्रता से संबंधित संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के खिलाफ है।
इस विधेयक में आपराधिक मामलों में पहचान और जांच के उद्देश्य से दोषियों और अन्य व्यक्तियों की माप लेने और रिकॉर्ड को संरक्षित करने का प्रावधान है।
उन्होंने कहा कि प्रस्तावित कानून व्यापक रूप से स्वीकृत इस सिद्धांत के खिलाफ भी है कि दोषी साबित होने तक हर व्यक्ति को निर्दोष माना जाना चाहिए। तिवारी ने आगे कहा कि विधेयक के प्रावधान बहुत अस्पष्ट हैं। राज्य और पुलिस इसका दुरुपयोग कर सकती है।
तिवारी ने कहा कि यह विधेयक भारत के लिए एक सर्विलांस देश बनने का रास्ता बनाएगा। प्रस्तावित कानून व्यापक रूप से स्वीकृत इस सिद्धांत के खिलाफ भी था कि दोषी साबित होने तक सभी को निर्दोष माना जाना चाहिए।
भाजपा सांसद ने किया विधेयक का बचाव
वहीं, भाजपा सांसद विष्णु दयाल राम ने कहा कि विधेयक के प्रावधान जांच एजेंसियों को मजबूत करेंगे और दोषसिद्धि दर बढ़ाने और अपराध की घटनाओं को कम करने में मदद करेंगे। उन्होंने कहा कि यह विधेयक सुप्रीम कोर्ट और कानून आयोग की रिपोर्ट के अनुसार है।
विष्णु दयाल ने कहा कि निजता का अधिकार आवश्यक है लेकिन यह बिना किसी प्रतिबंध के पूर्ण अधिकार नहीं हो सकता।
डीएमके और टीएमसी ने भी जताया विरोध
डीएमके सांसद दयानिधि मारन ने कहा कि यह विधेयक जनता विरोधी है और संघवाद की भावना के खिलाफ है। केंद्र पर ऐसा विधेयक लाकर एक सर्विलांस देश बनाने की कोशिश करने का आरोप लगाते हुए मारन ने कहा कि यह लोगों की निजता का उल्लंघन करता है।
तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की सांसद महुआ मोइत्रा ने कहा कि विधेयक में कैदियों की पहचान अधिनियम, 1920 को बदलने की मांग की है। लेकिन, प्रस्तावित कानून में ब्रिटिश उपनिवेशवादियों की ओर से बनाए गए कानून की तुलना में कम सुरक्षा उपाय हैं।
मोइत्रा ने कहा कि डाटा सुरक्षा कानून के अभाव में प्रस्तावित मानकों में सुरक्षा उपायों की कमी दिख रही है जो यह सुनिश्चित करने के लिए जरूरी हैं कि जो सूचना एकत्र की जा रही है उनकी सुरक्षा ठीक तरह से हो रही है। उन्होंने कहा कि यह विधेयक ऐसे व्यक्ति की निजता का उल्लंघन कर सकता है जो दोषी नहीं है।