12 दिन बाद लोकसभा चुनाव के पहले चरण का मतदान होगा। राहुल गांधी समेत कांग्रेस के एक दिग्गज नेता का कहना है कि जनता में केंद्र की सरकार के प्रति काफी नाराजगी है। बेरोजगारी, मंहगाई समेत तमाम मुद्दे असर करेंगे। केंद्र सरकार के एक मंत्री भी मानते हैं कि 10 साल से सरकार में हैं। थोड़ा-बहुत जनता में नाराजगी हो जाती है, लेकिन प्रधानमंत्री की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है। दूसरे विपक्ष के पास न मुद्दे हैं और न नेता। यहां तक कि मल्लिकार्जुन खरगे की जनसभा में जनता भी नहीं आती। इसलिए तीसरी बार भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में प्रचंड बहुमत की सरकार बननी तय है।
कांग्रेस के नेता पवन खेड़ा, जयराम रमेश या फिर महासचिव (संगठन) केसी वेणुगोपाल के सचिवालय में एक ही बात सुनने को मिलती है कि जनता इस बार अच्छे से सबक सिखाएगी। कांग्रेस को हाल ही में अलविदा कह चुके एक प्रवक्ता भी कहते थे कि दक्षिण भारत छोड़िए, उत्तर में भाजपा को तगड़ा झटका लगने वाला है। अब वह कह रहे हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने चतुराई और सतर्कता से इसे मैनेज कर लिया है। सूत्र का कहना है कि उत्तर भारत में एक बार विपक्ष को बड़ी निराशा मिलने वाली है।
विपक्ष की असल की परेशानी क्या है?
सरकार के खिलाफ राजनीतिक लड़ाई में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस है। समाजशास्त्री एसके सिंह कहते हैं कि कांग्रेस की समस्या थोड़ा जटिल है। सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के अलावा राष्ट्रीय स्तर पर उनके पास भीड़ जुटाऊ नेताओं का बड़ा टोटा है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे वरिष्ठ जरूर हैं, लेकिन कभी जन नेता की छवि में नहीं रहे हैं। इसलिए उनकी नेहरू गांधी परिवार पर बड़ी निर्भरता बनी हुई है। क्षेत्रीय नेताओं में आपसी तालमेल अभी नहीं बन पा रहा है। अपने अपने वर्चस्व में उलझे हैं।
पिछले कुछ महीने से कांग्रेस पार्टी के तमाम नेताओं ने पार्टी छोड़ी है। अधिकांश भाजपा में गए हैं। पहले से संगठन कमजोर होने के कारण इससे भी कांग्रेस की मुश्किल बढ़ी है। तीसरी बड़ी समस्या प्रभावी नेता को लेकर है। कांग्रेस या विपक्ष के पास ऐसा कोई बड़ा चेहरा नहीं है, जो विपक्ष के बड़े नेताओं में तालमेल, दबाव या आपसी संवाद के जरिए एकजुटता का वातावरण बना पाने में प्रभावी हो। एसके सिंह कहते हैं कि बिहार के मुख्यमंत्री के वापस एनडीए में जाने, ममता बनर्जी के पश्चिम बंगाल में अकेले चुनाव लड़ने का फैसला लेने, महाराष्ट्र में एनसीपी के टूटने से विपक्ष की संरचना धराशायी हुई है। इसके कारण विपक्ष का मंच सज नहीं पा रहा है।
पब्लिक सब जानती है, लेकिन उससे जुड़ने वाला भी तो चाहिए
माय एक्सिस के लिए काम कर चुके सूत्र का कहना है कि तमिलनाडु से जम्मू-कश्मीर तक सबको पता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार धार्मिक आधार से समझौता नहीं करती। बेरोजगारी, किसानी से लेकर तमाम मुद्दे जनता में हैं, लेकिन इन मुद्दों के साथ विपक्ष का जुड़ाव नहीं है। विपक्ष के नेता जनता को इससे जोड़ने में पिछड़ जा रहे हैं। सूत्र का कहना है कि अक्तूबर-नवंबर 2023 तक लग रहा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बड़ी चुनौती मिलेगी। लेकिन जिस तरह से बंगाल, महाराष्ट्र, बिहार, झारखंड और पंजाब में विपक्ष की चुनौती बढ़ी है, उसने सत्ताधारी दल के लिए काफी कुछ आसान कर दिया है।
अयूब खान कहते हैं कि आप राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा और भारत जोड़ो न्याय यात्रा का फर्क देख लीजिए। जब राहुल गांधी भारत जोड़ो यात्रा पर थे, तब उनका ग्राफ काफी बढ़ा था। कांग्रेस के नेता उनके साथ-साथ थे। जब राहुल गांधी ने भारत जोड़ो न्याय यात्रा शुरू की, तो ऐसा नहीं था। कांग्रेस के नेता इसमें कम शामिल हुए और इस दौरान तमाम कांग्रेस के नेताओं ने पार्टी छोड़ी। विपक्ष के अन्य नेताओं ने इंडी गठबंधन का साथ छोड़ा।