कांग्रेस-इंडिया गठबंधन के मुद्दे
कुछ राष्ट्रीय संदर्भों को छोड़ दें तो इन विधानसभा चुनावों को उन्हीं मुद्दों पर लड़ा जा रहा है जिन पर लोकसभा चुनाव लड़े जाने की संभावना है। कांग्रेस ने अपनी कार्य समिति में सर्वसम्मति से निर्णय ले लिया है कि वह जहां भी सरकार में है, वहां जातिगत जनगणना कराएगी। केंद्र में सत्ता में आने पर राष्ट्रीय स्तर पर जातिगत जनगणना कराने का पार्टी ने वादा कर दिया है। राहुल गांधी ने कह दिया है कि पिछड़ी जातियों को उनका पर्याप्त प्रतिनिधित्व और अधिकार देने के लिए कांग्रेस आरक्षण की ऊपरी सीमा को भी बढ़ाने का काम करेगी। लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस इन्हीं मुद्दों पर चुनाव लड़ेगी, यह तय हो गया है।
भाजपा के मुद्दे
वहीं, भाजपा इन विधानसभा चुनावों में भी नरेंद्र मोदी सरकार के 9 साल के कामकाज की चर्चा कर रही है। केंद्र की कल्याणकारी योजनाओं पर जनता के बीच बहस की जा रही है। मोदी के शासन में कश्मीर और उत्तर-पूर्व के कुछ मामलों को छोड़कर देश के ज्यादातर हिस्सों में आतंकवाद, चरमपंथ और अलगाववाद का साया नहीं पड़ा। लोकसभा-विधानसभाओं में महिला आरक्षण देने और ओबीसी, दलित और आदिवासी समुदाय के लिए किए गए कामकाज भाजपा के एजेंडे में सबसे ऊपर हैं। माना जा रहा है कि भाजपा लोकसभा चुनाव में भी इन्हीं मुद्दों पर दांव लगाएगी।
सेमीफाइनल कैसे?
इन पांच राज्यों (राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम) में देश के कुल विधायकों के लगभग छठवें हिस्से (679 विधायकों) का चुनाव होना है। इसमें कुल मतदाताओं का लगभग छठवां हिस्सा (16 करोड़ से ज्यादा) हिस्सा लेगा जिसमें महिलाओं और पहली बार वोट करने वाले 60 लाख युवा मतदाताओं की बड़ी हिस्सेदारी रहने वाली है। इन राज्यों में उत्तर भारत, दक्षिण भारत और पूर्वाोत्तर राज्यों का भी प्रतिनिधित्व शामिल है। ऐसे में एक छोटे प्रतिशत के रूप में राष्ट्रीय चुनावों के तौर पर एक बड़ा सैंपल हो सकता है जो देश का मूड बताने के लिए पर्याप्त होगा। माना जा सकता है कि इन राज्यों के चुनाव परिणाम काफी हद तक देश का मूड बताने के लिए पर्याप्त होंगे कि अगले लोकसभा चुनाव के क्या परिणाम हो सकते हैं। यही कारण है कि इन चुनावों में भाजपा और कांग्रेस ने अपनी पूरी ताकत लगा दी है।
क्या मोदी के चेहरे पर मिलेगी जीत?
तथ्य है कि इसके पहले 2018 में इन्हीं राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा को करारी हार मिली थी, लेकिन इसके बाद हुए लोकसभा चुनावों में भाजपा ने राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में बड़ी जीत हासिल की थी तो तेलंगाना में भी उसने अपने पांव जमा लिए थे। उस अनुभव के आधार पर भाजपा नेता व्यक्तिगत बातचीत में अभी से यह दावा कर रहे हैं कि इन विधानसभा चुनावों का परिणाम चाहे कुछ भी हो, राष्ट्रीय चुनावों में एक बार फिर वह इन राज्यों की सभी सीटों पर जीत हासिल करने में सफल रहेगी।
लोकसभा में मोदी के चेहरे का लाभ
भाजपा इन विधानसभा चुनावों में भी मोदी के चेहरे पर ही वोट मांग रही है, लेकिन मतदाताओं को यह पता है कि यह चुनाव उनके स्थानीय नेताओं के लिए है, लिहाजा माना जाता है कि स्थानीय नेतृत्व से तुलना होने के कारण विधानसभा चुनाव परिणाम प्रभावित होता है। भाजपा के एक राष्ट्रीय नेता ने अमर उजाला से कहा कि जब यही चुनाव राष्ट्रीय संदर्भों में होंगे तब मतदाता राष्ट्रीय सोच को प्राथमिकता देगा और उस स्थिति में मतदाताओं के सामने मोदी के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं होगा। उनका दावा है कि मोदी अभी भी देश के सबसे लोकप्रिय नेता हैं और प्रधानमंत्री की लोकप्रियता के सहारे भाजपा तीसरी बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने में सफल रहेगी।
लेकिन बदल गई हैं ये परिस्थितियां
राजनीतिक विश्लेषक संजय कुमार ने अमर उजाला से कहा कि अभी से यह दावा नहीं किया जा सकता कि यदि पिछली बार भाजपा ने विधानसभा चुनावों में हार के बाद भी लोकसभा चुनावों में जीत हासिल की थी तो इस बार भी वह जीत हासिल कर लेगी। पिछले लोकसभा चुनाव में पुलवामा-बालाकोट के मामले ने पूरी चुनावी फिजां बदल दी थी तो इस बार भाजपा को 10 साल के एंटी इनकमबेंसी फैक्टर का भी सामना करना पड़ेगा।
यदि पिछली बार भाजपा को अपनी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ मिला था तो इस बार उसे मजबूत इंडिया गठबंधन की नई रणनीति जातीय जनगणना औऱ आरक्षण का सामना करना पड़ेगा। चूंकि, ये मुद्दे तीन दशकों तक देश की राजनीति को प्रभावित करते रहे हैं, माना जा सकता है कि जातिगत जनगणना और आरक्षण की ऊपरी सीमा को बढ़ाने का कांग्रेस का वादा भाजपा के सामने बड़ी परेशानी खड़ी कर सकता है।