केंद्र सरकार में पुरानी पेंशन व्यवस्था को लागू कराने के लिए कर्मचारी संगठन कमर कसने लगे हैं। कर्मचारी संगठनों का कहना है कि 'पेंशन' कोई इनाम नहीं है, बल्कि एक अधिकार है। सरकारी कर्मियों को उनके बुढ़ापे के आगोश में नहीं छोड़ा जा सकता। पुरानी पेंशन व्यवस्था को लागू कराने और एनपीएस की वापसी के लिए 25 लाख कर्मचारी दिल्ली में दहाड़ेंगे। इनमें रेलवे कर्मियों की यूनियन और एआईडीईएफ, जो चार लाख रक्षा नागरिक कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व करता है, शामिल हैं। इनके अलावा दूसरे विभागों के भी लाखों कर्मी उक्त दहाड़ में शामिल होंगे।
राष्ट्रीय परिषद (जेसीएम) में कर्मचारी पक्ष की तरफ से बोलने वाले और अखिल भारतीय रक्षा कर्मचारी महासंघ 'एआईडीईएफ' के महासचिव श्रीकुमार ने कहा है कि सरकार, पेंशन को एक इनाम समझ रही है। पेंशन, नियोक्ता की मधुर इच्छा के आधार पर अनुग्रह की बात नहीं है। यह 1972 के नियमों के अधीन निहित है। पेंशन अनुग्रह राशि का भुगतान नहीं है, बल्कि यह पिछली सेवा के लिए भुगतान है। यह उन लोगों को सामाजिक आर्थिक न्याय प्रदान करने वाला एक उपाय है, जिन्होंने अपने जीवन के सुनहरे दिनों में नियोक्ता के लिए लगातार इस आश्वासन पर कड़ी मेहनत की है कि उनके बुढ़ापे में उन्हें आगोश में नहीं छोड़ा जाएगा।
राजस्थान सरकार द्वारा नई पेंशन योजना को वापस लेने और अपने कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन योजना बहाल करने के बाद, पूरे देश में एनपीएस के खिलाफ आंदोलन तेज हो रहा है। एआईडीईएफ, जो चार लाख रक्षा नागरिक कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व करता है, उसमें से 50 फीसदी एनपीएस कर्मचारी हैं। पिछले दिनों चेन्नई के अवादी में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में पुरानी पेंशन को लेकर एक विस्तृत प्रस्ताव पारित किया गया है। इसमें भारत सरकार से एनपीएस को वापस लेने का आग्रह किया गया है। वजह, 18 साल की सेवा के बाद कर्मचारियों को केवल एक मामूली पेंशन मिल रही है जो कि वृद्धावस्था पेंशन से भी कम है।
एआईडीईएफ ने रेलवे और केंद्र सरकार के अन्य कर्मचारियों को शामिल करके अपने संघर्ष को तेज करने का फैसला किया है। सितंबर के दौरान दिल्ली में एक विशाल प्रदर्शन किया जाएगा। रेलवे एवं एआईडीईएफ सहित अन्य कर्मचारी संगठनों ने गैर-गारंटी राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (एनपीएस) को समाप्त करने और सीसीएस (पेंशन) नियम 1972 के तहत परिभाषित पेंशन योजना को बहाल करने की मांग का संकल्प लिया है। एनपीएस में सुनिश्चित और गारंटीकृत पेंशन का प्रावधान नहीं है। राष्ट्रीय परिषद (जेसीएम) के कर्मचारी पक्ष ने मद संख्या 02/05/एनसी-44 में तत्कालीन कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में राष्ट्रीय परिषद (जेसीएम) की 44वीं साधारण बैठक में एनपीएस को खारिज किया है। 14 अक्तूबर 2006 को आयोजित राष्ट्रीय परिषद (जेसीएम) की 45वीं बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा की गई। कर्मचारी पक्ष का कहना है कि एनपीएस, शेयर बाजार की अनिश्चितताओं के अधीन है। पहली जनवरी 2004 के बाद भर्ती किए गए कर्मचारियों को सीसीएस (पेंशन) नियम 1972 के तहत पेंशन का हकदार बनाया जाना चाहिए।
जो कर्मचारी एक जनवरी 2004 को या उसके बाद भर्ती हुए थे, जिन्होंने अब सेवानिवृत्त होना शुरू कर दिया है, उन्हें न तो पुरानी पेंशन योजना के तहत आने वाले कर्मचारियों पर लागू न्यूनतम पेंशन प्लस डीए मिल रहा है और न ही कर्मचारियों द्वारा आहरित अंतिम मूल वेतन की 50 फीसदी राशि प्राप्त हो रही है। बतौर, सी. श्रीकुमार, यह स्पष्ट हो गया है कि एनपीएस को बिना किसी दिमाग के इस्तेमाल के जल्दबाजी में पेश किया गया था। यह निर्णय विशुद्ध रूप से आर्थिक तर्क के आधार पर लिया गया है। एआईडीईएफ की राष्ट्रीय कार्यकारी ने भारत सरकार का ध्यान, सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की तरफ आकर्षित किया है, जिसमें कहा गया है कि पेंशन एक अधिकार है, जो कानून द्वारा लागू करने योग्य है। कई राज्य सरकारों ने अब एनपीएस को खत्म करना और पुरानी पेंशन को बहाल करना शुरू कर दिया है। श्रीकुमार ने केंद्र सरकार के कर्मचारियों से बिना गारंटी वाले एनपीएस के खिलाफ अथक रूप से लड़ने और एनपीएस को वापस लेने तक निरंतर संघर्ष जारी रखने का आह्वान किया है। पुरानी पेंशन बहाली के लिए नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक विशाल रैली/प्रदर्शन आयोजित किया जाएगा।