फांसी देने से पहले जल्लाद को कई तरह की प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। जल्लाद, लीवर खींचने के अलावा कई दूसरे काम भी करता है। दोषी के चेहरे पर काला कपड़ा ढकते वक्त जल्लाद उसे चुपके से क्या कहता है। वे शब्द सुनकर दोषी भी अपनी गर्दन घुमाकर जल्लाद की ओर देखने लगता है। जल्लाद थोड़ा झुक कर दोषी व्यक्ति से कहता है कि मुझे क्षमा करना। इसमें मेरा कोई हाथ नहीं है। मैं केवल अपनी वो ड्यूटी पूरी कर रहा हूं, जिसका आदेश मुझे ऊपर से मिला है।
क्षमा करना दोस्त, अलविदा, राम-राम, सलाम आदि शब्द जल्लाद के मुंह से सुनने को मिलते हैं। अमूमन ये शब्द दोषी को उसके धर्म के मुताबिक बोले जाते हैं। दोषी हिंदू है, तो जल्लाद बोलेगा राम-राम। अगर वह मुस्लिम है तो जल्लाद अलविदा या मेरा आखिरी सलाम स्वीकार करो दोस्त, बोलता है।
तिहाड़ जेल में लंबे समय तक अपनी सेवाएं देने वाले एक पूर्व अधिकारी ने बताया कि किसी भी व्यक्ति को फांसी देने की प्रक्रिया बहुत संजीदगी से पूरी की जाती है। उस वक्त किसी को भी इससे कोई मतलब नहीं होता कि दोषी को किस अपराध में फांसी दी जा रही है। सभी अधिकारी और कर्मचारी अपना-अपना काम करते हैं। मुश्किल से दर्जनभर कर्मचारी वहां मौजूद रहते हैं। सुरक्षाकर्मी थोड़ी दूरी पर होते हैं। इस सारी प्रक्रिया में जल्लाद की भूमिका बहुत अहम होती है। वह कई दिन पहले से ही फांसी की तैयारियों में जुट जाता है। यदि प्रक्रिया के अंतिम दौर की बात करें, तो वह जल्लाद के लिए सबसे ज्यादा भाव पूर्ण वक्त होता है।
जब वह दोषी के चेहरे पर काला कपड़ा ढकता है, तो उसी वक्त बहुत धीमी आवाज में, जो किसी तीसरे व्यक्ति तक न पहुंचे, जल्लाद कुछ कहता है। जल्लाद एक तरफ दोनों हाथों से काला कपड़ा दोषी के मुंह पर डालता है, तो दूसरी ओर कहता है कि भाई मुझे क्षमा करना। इसमें मेरा कोई दोष या स्वार्थ नहीं है। मैं केवल अपना काम कर रहा हूं। ये मेरी ड्यूटी है, मुझे इसका मेहनताना मिलता है। पूर्व अधिकारी के मुताबिक ये सब बातें जल्लाद अपनी मनमर्जी से नहीं, बल्कि अनिवार्य तौर पर उसे बोलनी पड़ती हैं। इसकी रिहर्सल भी होती है। दोषी का जो भी धर्म होता है, उसी के अनुसार ये बोलने पड़ते हैं।
जल्लाद जब ये शब्द बोलता है, तो दोषी उसकी ओर गर्दन घुमाकर देखने लगता है। वह समय बहुत भावपूर्ण होता है। उसके बाद जल्लाद सिर झुकाकर लीवर के सामने जा खड़ा होता है। जैसे ही आदेश मिलता है, वह लीवर खींच देता है। फट्टा खुल जाता है और दोषी फंदे पर झूलने लगता है।
जल्लाद को अलग से पैसे मिलते हैं
यदि कोई जल्लाद अनुबंध पर नियुक्त होता है, तो भी उसे फांसी के लिए अलग से मेहनताना दिया जाता है। जैसे इंदिरा गांधी के हत्यारे को फांसी देने वाले जल्लाद को 25 हजार रुपये दिए गए थे। अभी यह तय नहीं है कि तिहाड़ जेल में निर्भया के चारों दोषियों को फांसी देने वाले जल्लाद को कितने पैसे दिए जाएंगे। हो सकता है कि प्रति फांसी उसे दस हजार या उससे अधिक की राशि मिल जाए। यह सब जेल प्रशासन तय करता है। जल्लाद का काम केवल लीवर खींचना नहीं है। फांसी की प्रक्रिया पूरी होने के बाद दोषी को फंदे से नीचे उतारना और उसे प्लेटफार्म से बाहर निकालना, जैसे कई काम जल्लाद को करने पड़ते हैं।