11 अगस्त को नेपाल गए थे भारतीय विदेश सचिव
विदेश मंत्रालय ने एक बयान में कहा था कि भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर के निमंत्रण पर राणा भारत आ रही हैं। कार्यभार संभालने के बाद राणा की यह पहली आधिकारिक विदेश यात्रा है। आरजू राणा देउबा की यह यात्रा प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की अध्यक्षता में गुरुवार को हुई कैबिनेट की बैठक के बाद हो रही है, जिसमें विदेश मंत्री के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल के भारत दौरे के कार्यक्रम को मंजूरी दी गई थी। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि देउबा की यह यात्रा दोनों देशों के बीच "अद्वितीय और घनिष्ठ" संबंधों का प्रमाण है। इससे पहले भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री 11 अगस्त को दो दिवसीय यात्रा पर काठमांडू पहुंचे थे। पिछले महीने ही प्रधानमंत्री केपी ओली शर्मा के फिर से सत्ता संभालने के बाद नेपाल सरकार ने भारत को आश्वासन दिया था कि वह अपनी जमीन को पड़ोसी देश के खिलाफ आतंकवाद के लिए इस्तेमाल नहीं होने देंगे। विदेश मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, 62 वर्षीय राणा की यात्रा के दौरान दिल्ली में स्वास्थ्य जांच भी होगी। उनका 22 अगस्त को नेपाल लौटने का कार्यक्रम है।
2020 के बाद नहीं हुई नेपाली गोरखाओं की भर्ती
वहीं, नेपाली विदेश मंत्री की भारत यात्रा के दौरान भारतीय सेना में गोरखाओं की भर्ती का मुद्दा भी उठ सकता है। भारत और नेपाल के विदेश मंत्रियों के बीच द्विपक्षीय वार्ता ने रुकी हुई गोरखा भर्ती के समाधान की उम्मीद जगाई है। 2020 के बाद से भारतीय सेना में एक भी नेपाली गोरखा की भर्ती नहीं हुई है। कोविड-19 के कारण भर्ती रैलियां पर रोक लगा दी गई थी। वहीं कोविड के बाद भारत सरकार जून 2022 में अग्निपथ योजना ले कर आ गई थी। नेपाल ने अग्निपथ योजना के तहत भारतीय सेना में चार साल के लिए गोरखाओं की भर्ती को लेकर आपत्ति जताई थी। जिसके बाद दोनों देशों के बीच भर्ती को लेकर गतिरोध चल रहा है।
भर्ती के दूसरे रास्ते तलाश रहे हैं नेपाली गोरखा
इससे पहले नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल 'प्रचंड' पिछले साल जब भारत यात्रा पर आए थे, तो उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने ये गोरखाओं की भर्ती को लेकर मुद्दा उठाया था, लेकिन कोई समाधान नहीं निकला और नेपाल ने अग्निपथ योजना के तहत भारतीय सेना में गोरखा भेजने बंद कर दिए। अग्निपथ भर्ती योजना की वजह से नेपाल और भारत के बीच 200 साल के सैन्य संबंधों की विरासत खतरे में पड़ चुकी है। वहीं नेपाली गोरखा भर्ती के दूसरे रास्ते तलाश रहे हैं। नेपाल के पूर्व विदेश मंत्री नारायणकाजी श्रेष्ठा ने खुलासा किया था कि नेपाली गोरखा युवा रूस की सेना में भर्ती हो रहा है। यह संख्या तकरीबन 15 हजार से ज्यादा है। उनका कहना था कि रूस अच्छे पैकेज का लालच देकर नेपाली गोरखाओं को अपनी सेना में भर्ती कर रहा है। लेकिन वहां जाने पर उन्हें सीधे मोर्चे पर भेज दिया जाता है और वहां वे यूक्रेनी सेना की गोलियों को शिकार हो रहे हैं।
अग्निपथ स्कीम अपनाएं नेपाली गोरखा
काठमांडू के कोटेश्वर इलाके में स्थित लॉयल गोरखा ट्रेनिंग सेंटर के मैनेजर प्रदेश राय ने अमर उजाला को बातचीत में बताया था कि भारत की अग्निपथ योजना की वजह से नेपाल के गोरखाओं को अन्य रोजगार विकल्पों खोजने के लिए मजबूर होना पड़ा है। भर्ती शर्तों को लेकर नेपाल और भारत के बीच बातचीत में गतिरोध बना हुआ है। जिसके चलते रूसी सेना में भर्ती होना कई निराश गोरखाओं के लिए एक आकर्षक विकल्प के तौर पर सामने आया है। उनका कहना था कि नेपाल सरकार को चाहिए कि वह अग्निपथ को लेकर भारत सरकार के साथ बातचीत करे। कुछ सौदेबाजी करे, तो शायद बात बन जाए। वह कहते हैं कि नेपाल में रोजगार नहीं है। नेपाली सेना में गोरखाओं की भर्ती की इतनी गुंजाइश नहीं है। ऐसे में नेपाल सरकार को भी अपना रुख लचीला रखना चाहिए। नेपाली गोरखाओं को अग्निपथ स्कीम अपनानी चाहिए, भले ही चार साल के लिए ही सही। अग्निपथ स्कीम में सिक्योरिटी है और आगे के लिए अच्छे चांस हैं।
भारत ने गोरखा सैनिकों के परिजनों को दिए 125.5 मिलियन नेपाली रुपये
इससे पहले नेपाल स्थित भारतीय दूतावास ने गुरुवार को भारत के 78वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर भारतीय सशस्त्र बलों में सेवा देने वाले दिवंगत गोरखा सैनिकों की विधवाओं और उनके निकटतम संबंधियों को 125.5 मिलियन नेपाली रुपये की सहायता राशि वितरित की। नेपाल में भारत के राजदूत नवीन श्रीवास्तव ने एक समारोह में, बकाया राशि के अलावा, भारतीय सशस्त्र बलों के 107 दिवंगत सदस्यों की विधवाओं और उनके निकट संबंधियों को सेना समूह बीमा कार्यक्रम के अंतर्गत लाभ प्रदान करने वाली 125.5 मिलियन नेपाली रुपये की धनराशि सौंपी।
क्या है गोरखा सोल्जर पैक्ट 1947?
साल 1947 में आजादी के दौरान भारत में 10 गोरखा रेजीमेंट हुआ करती थीं। लेकिन गोरखा सोल्जर पैक्ट 1947 के तहत इनमें से छह भारतीय सेना का हिस्सा बनी रहीं, जबकि बाकी चार रेजिमेंट ब्रिटिश सेना का हिस्सा बन गईं। वहीं नेपाली गोरखाओं की भर्ती न होने से भारतीय सेना की पारंपरिक जातीय गोरखा बटालियनों में गोरखा सैनिकों की काफी कमी हो गई है। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार मौजूदा वक्त में भारतीय सेना में सात गोरखा रेजिमेंट हैं और उनकी 39 बटालियन हैं, जिनमें लगभग 32,000 गोरखा सैनिक हैं। इनमें लगभग 60 फीसदी सैनिक नेपाल से हैं और 40 फीसदी भारत के गोरखाली समुदाय से हैं। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, भारतीय सेना अभी भी अपने सात गोरखा रेजिमेंटों में 15,000 से अधिक सैनिकों की कमी का सामना कर रही है। लेकिन, अग्निपथ स्कीम आने के बाद नेपाल और भारत सरकार के बीच मतभेद शुरू हो गए। नेपाल सरकार ने कह दिया कि वह गोरखा रेजीमेंट के लिए अग्निपथ योजना के तहत गोरखाओं को भर्ती के लिए नहीं भेजेगी, क्योंकि यह गोरखा सोल्जर पैक्ट 1947 का उल्लंघन है।
बता दें, कि भारत के नेपाल के साथ सदियों से "रोटी बेटी" के संबंध रहे हैं। वहीं, नेपाल की सीमा पांच भारतीय राज्यों - सिक्किम, पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के साथ 1,850 किलोमीटर से अधिक लंबी है। चारों ओर से जमीन से घिरा नेपाल माल और सेवाओं के परिवहन के लिए भारत पर बहुत अधिक निर्भर है।