'वकील में ईमानदारी की कमी'
न्यायमूर्ति विक्रमनाथ और न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा की पीठ मामले पर सुनवाई कर रही थी। पीठ ने कहा कि दिल्ली उच्च न्यायालय ने वकील की माफी को स्वीकार न करके अच्छा किया। वकील में ईमानदारी की कमी थी। शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ता की उम्र और स्वास्थ्य संबंधी बीमारियों पर विचार किया और उच्च न्यायालय की ओर से दी गई तीन महीने के कारावास की सजा को 'अदालत के उठने तक कारावास' में बदल दी।
क्या है पूरा मामला?
मामला 17 अगस्त, 2006 को हुआ था। वकील गुलशन बाजवा उच्च न्यायालय में एक मामले में पेश हुए थे। इसी दौरान उन्होंने एक महिला वकील को कथित तौर पर धमकी दी थी। इसके बाद जब उन्हें नोटिस जारी किया तो वह पेश नहीं हुए। बाजवा ने तब उसी मामले में आवेदन दायर किया था। इस आवेदन में उन्होंने उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के खिलाफ ही आरोप लगा दिए थे।
हम उच्च न्यायालय के फैसले पर क्या कहा?
पीठ ने मंगलवार को अपने आदेश में कहा, 'हम उच्च न्यायालय के उस फैसले से पूरी तरह सहमत हैं, जिसमें न्यायिक अधिकारियों को गरिमा और प्रतिष्ठा बनाए रखने को कहा गया है और प्रेरित, आलोचनात्मक और निराधार आरोप लगाने से बचने की जरूरत पर जोर दिया गया है।' पीठ ने कहा, 'हमारा यह भी मानना है कि उच्च न्यायालय ने अपीलकर्ता (वकील) की माफी अस्वीकार करके सही किया।' शीर्ष अदालत ने कहा, 'उनमें ईमानदारी की कमी थी।'
शीर्ष अदालत ने कहा, 'उच्च न्यायालय ने वकील के व्यवहार में एक पैटर्न देखा। उन्हें उस पीठ के साथ दुर्व्यवहार करने की आदत है, जो उनसे सहमत नहीं है।' अदालत ने कहा, 'अपीलकर्ता के खिलाफ दोषसिद्धि के आदेश में दखल देने की कोई जरूरत नहीं है।'
सीईसी की जगह लेगी समिति
सर्वोच्च न्यायालय ने विशेषज्ञों की एक स्थायी समिति को दो दशक पुरानी केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी) की जगह लेने की मंजूरी दी। केंद्र ने इस स्थायी समिति का गठन पर्यावरण और वन मामलों से जुड़े मुद्दों पर परामर्श के लिए किया था। पिछले साल पांच सितंबर को पर्यावरण मंत्रालय ने पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 3 (3) के तहत अधिसूचना जारी कर सीईसी को एक स्थायी निकाय बनाया था।
न्यायमूर्ति बीआर गवई की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने कहा, 'जब भी जरूरी होगा, शीर्ष अदालत न्यायिक समीक्षा करेगी, खासतौर पर पर्यावरण के मामलों में'। पीठ ने कहा, 'पांच सितंबर 2023 की अधिसूचना के आधार पर एक स्थायी निकाय के रूप में इसे संस्थागत किया जाना चाहिए।'