यह अहम बात है कि पिछले पांच-छह साल के दौरान खेलों पर फोकस काफी ज्यादा बढ़ाया गया। इसका असर खेल बजट में भी दिखाई दिया, लेकिन जब देश टोक्यो ओलंपिक की तैयारियों में जुटा था तो बजट में खासी कटौती कर दी गई। दरअसल, केंद्र सरकार ने खेलों के लिए 2020-21 में 2,596 करोड़ का बजट प्रस्तावित किया, जो पिछले वित्तीय वर्ष के मुकाबले 230.78 करोड़ रुपये कम था। यानी सरकार ने ओलंपिक गेम्स वाले साल में ही खेल बजट में 8.16 फीसदी की कटौती कर दी थी। हालांकि, इस कटौती के पीछे कोरोना महामारी के चलते एक साल तक खेलकूद नहीं होने का हवाला दिया गया।
फेडरेशन की राजनीति, इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी और प्रतिभा को सही प्रशिक्षण न मिलने से देश में खिलाड़ियों को अक्सर परेशान होना पड़ता था। न तो उन्हें सही डाइट मिलती थी और न ही सुविधाएं, जिससे ओलंपिक जैसे बड़े आयोजनों में इसका असर नजर आता था। इसके बाद खेलो इंडिया की शुरुआत की गई तो खिलाड़ियों को आगे बढ़ने का नया रास्ता मिला। वहीं, सरकार ने भी खेलों पर अपना ध्यान बढ़ा दिया। खेल बजट भी लगातार बढ़ाया गया, जिससे खिलाड़ियों के लिए स्टेडियम आदि की सहूलियत बढ़ाने पर काम किया गया। उन्हें विदेशों में प्रशिक्षण भी दिलाया गया। गौर करने वाली बात यह है कि खेलो इंडिया के पहले चरण की शुरुआत भले ही 2018-19 में हुई, लेकिन सरकार ने इसके लिए बजट का प्रावधान 2015-16 से ही शुरू कर दिया था।
कहने को स्पोर्ट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया यानी साई देश के खेल मंत्रालय का अहम हिस्सा है, लेकिन खेलो इंडिया के प्रति रुझान बढ़ने के बाद पिछले पांच साल के दौरान साई के बजट में खासा इजाफा नजर नहीं आया। साई का बजट 2015-16 के दौरान करीब 407 करोड़ रुपये था, जो 2020-21 तक महज 500 करोड़ हो पाया। बता दें कि यह संस्थान अपनी खेल प्रोत्साहन योजनाओं के माध्यम से युवाओं की प्रतिभा निखारने का काम करता है। इसके अलावा उन्हें जरूरी सुविधाएं, प्रशिक्षण और प्रतियोगिताओं के मौके देता है।