नांदेड़ के सरकारी अस्पताल में 48 घंटों में 31 मरीजों की जान जाने के मामले ने तूल पकड़ लिया है। मामले में जमकर राजनीति हो रही है। इस बीच एक व्यक्ति ने अस्पताल प्रबंधन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उसका दावा है कि उसके नवजात बच्चे की जान चली गई और उसकी पत्नी डॉक्टरों की लापरवाही की वजह से परेशान है।
डॉक्टरों पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए नागेश सोलंके ने दावा किया कि मेरे बच्चे का वजन कम नहीं था और वह बिल्कुल ठीक था। पता नहीं मेरे बच्चे को क्या हुआ जो अब नहीं रहा। मैंने अपना बच्चा खो दिया, सीजेरियन सेक्शन के कारण मेरी पत्नी की सेहत पर बुरा असर पड़ा। मैंने अपना सब कुछ खो दिया।
सोलंके ने बताया कि नांदेड़ के एक निजी अस्पताल में पत्नी की सीजेरियन सेक्शन प्रक्रिया हुई। निजी अस्पताल के डॉक्टरों ने दावा किया कि बच्चा ठीक है, लेकिन उसे चार-पांच दिनों तक ग्लास (वार्मर) में रखने की जरूरत है। मैं पत्नी की सर्जरी के लिए पहले ही पैसे खर्च कर चुका था और आगे बच्चे के इलाज के लिए इतनी बड़ी रकम वहन करने में असमर्थ था। इसलिए हम नांदेड़ के सरकारी अस्पताल आए।
उन्होंने बताया कि बच्चे को 30 सितंबर की शाम करीब छह बजे अस्पताल में भर्ती कराया गया था। बाद में वह सुविधा के बाहर एक मेडिकल स्टोर से दवाएं लाया और उन्हें एक डॉक्टर को सौंप दिया। सोलंके के मुताबिक, उनका बच्चा एक अक्तूबर की रात करीब दो बजे तक ठीक था। बाद में सुबह लगभग चार बजे डॉक्टरों ने कहा कि वे बच्चे को किसी बड़ी मशीन पर रख रहे हैं। उन्होंने मुझे इसका नाम नहीं बताया।
उन्होंने बताया कि हम बाहर इंतजार कर रहे थे। उन्होंने हमसे हस्ताक्षर मांगे। फिर महज 10-15 मिनट में ऐसा क्या हुआ कि मेरा बच्चा मर गया। मेरे बच्चे के अलावा दो अन्य बच्चे (दोनों जुड़वां) भी मर गए। उन्होंने हमें अंदर बुलाया और मौत के बारे में बताया। उन्होंने पूछा कि अस्पताल में एक दिन में 12 बच्चे कैसे मर सकते हैं?
उन्होंने दावा किया कि यह तभी संभव है जब मशीनें काम नहीं कर रही हों और डॉक्टर लापरवाही बरत रहे हों। डीन भी सुविधा पर कोई ध्यान नहीं देते हैं। भावुक होते हुए उन्होंने कहा कि बच्चे के लिए नौ महीने तक इंतजार करने के बाद अब वह सब कुछ खो चुके हैं।
उन्होंने कहा कि मैंने अपना बच्चा और अपना पैसा खो दिया। डॉक्टरों (निजी अस्पताल) ने बच्चे के इलाज के लिए पैसे मांगे, इसलिए हम यहां आए। यह डॉक्टरों की लापरवाही के कारण यह हो गया। यहां सुविधाओं की कमी थी, उन्होंने इसके लिए कुछ नहीं किया। यहां तक कि मुझे अंदर जाने और हमारे बच्चे को देखने की अनुमति भी नहीं दी। मैं बस एक बार अस्पताल के डीन से मिलना चाहता हूं।
क्या है मामला?
इससे पहले मध्य महाराष्ट्र के नांदेड़ जिले के डॉ. शंकरराव चव्हाण सरकारी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में 30 सितंबर से 48 घंटों में 16 शिशुओं समेत 31 मौतें हुईं। 30 सितंबर से एक अक्तूबर के बीच अस्पताल में 12 शिशुओं समेत 24 मौतें हुईं। इसमें सोलंके का बच्चा भी शामिल था। अधिकारियों के मुताबिक, एक और दो अक्तूबर के बीच सात और मौतें हुईं।
सरकार ने क्या कहा?
महाराष्ट्र के चिकित्सा शिक्षा मंत्री हसन मुश्रीफ ने मंगलवार को कहा कि नांदेड़ के सरकारी अस्पताल में बड़ी संख्या में मरीजों की मौत के कारणों की जांच की जाएगी। उन्होंने वादा किया कि अगले 15 दिनों में अस्पताल में हालात बेहतर हो जाएंगे। मुश्रीफ ने यह भी कहा कि अस्पताल में दवाओं की कोई कमी नहीं है और अगर मौतें किसी की लापरवाही के कारण हुई हैं, तो कार्रवाई की जाएगी। मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने भी कहा कि उनकी सरकार ने नांदेड़ अस्पताल में हुई मौतों को बहुत गंभीरता से लिया है। विस्तृत जांच के बाद उचित कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने दवाओं और कर्मचारियों की कमी से इनकार किया।