गांधी जयंती के मौके पर राष्ट्रपिता के व्यक्तितत्व, कृतित्व व विचारों पर आधारित एक नई पुस्तक आई है। इसमें दावा किया गया है कि महात्मा गांधी कारोबार और पूंजीवाद के खिलाफ नहीं थे। यह बुक गांधीजी को एक मैनेजमेंट गुरु और मूल विचारक के रूप में पेश करती है। इसमें गांधीजी के विचारों को बाजार पूंजीवाद को समृद्ध करने वाला बताया गया है।
'इकॉनामिस्ट गांधी: द रूट्स एंड्स रिलेवेंस ऑफ द पोलिटिकल इकोनॉमी ऑफ द महात्मा' शीर्षक की यह किताब सेवानिवृत्त उद्यमी जेरी राव ने लिखी है। इसमें राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के व्यक्तित्व के छिपे पहलुओं और अर्थशास्त्र व पूंजीवाद को लेकर उनके विचारों को सामने लाया गया है। नई किताब में धर्म, नीति, मानव स्वभाव, शिक्षा व समाज को लेकर भी गांधीजी के विचारों को पेश किया गया है।
एम्फैसीएस के संस्थापक हैं जेरी राव
पुस्तक के लेखक जेरी राव का पूरा नाम नाम जैतीर्थ राव है, लेकिन वह जेरी राव के रूप में ख्यात हैं। वे एक भारतीय व्यवसायी और उद्यमी हैं। वह सॉफ्टवेयर कंपनी एम्फैसीएस के संस्थापक और पूर्व सीईओ हैं। वह वैल्यू एंड बजट हाउसिंग कॉरपोरेशन (वीबीएचसी) के संस्थापक हैं।
बुक में बताया गया है कि कारोबार को लेकर किस तरह से गांधीजी का दृष्टिकोण सकारात्मक था। वह गरीबी के खिलाफ थे और चाहते थे कि हर भारतीय आरामदायक जीवन का आनंद ले। लेखक का कहना है कि गांधीजी की बिजनेस के प्रति सकारात्मक सोच का मूल उनकी जाति में निहित है। यह उनके कई कार्यों में भी प्रदर्शित होता है।
जेरी राव ने अपनी बुक में लिखा है कि गांधीजी एक मुस्लिम कारोबारी के वकील के तौर पर दक्षिण अफ्रीका गए थे। वह मुस्लिम कारोबारी भी मूल रूप से बनिया था, लेकिन कुछ वर्ष पूर्व ही उसने इस्लाम धर्म अपना लिया था। दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी के दो सहयोगी पोलक व कल्लेनबेच थे। ये यहूदी कारोबारी थे। जब गांधीजी भारत लौटे तो वे अंबालाल साराभाई के करीबी थे। साराभाई ने अहमदाबाद में गांधी आश्रम के लिए पैसा दिया था।
जमनालाल बजाज को माना जाता था गांधीजी का पांचवां बेटा
जेरी राव का कहना है कि महात्मा गांधी मारवाड़ी बनिये और ख्यात कारोबारी रहे जमनालाल बजाज के भी करीबी थे। जिन्हें कई बार गांधीजी का पांचवां बेटा माना जाता था। पेंगुइन रेंडम हाउस द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक के लेखक का दावा है कि गांधीजी के गृह राज्य गुजरात में जाति प्रणाली का विकास, व्यापार व वित्तीय नेटवर्क, चैरिटी का संगठित रूप का उनकी विचारधारा पर साफ असर पड़ा, वहीं राजनीति व व्यवसाय को लेकर भी उनका स्पष्ट नजरिया बना। लेखक का यह भी मानना है कि सभी डेटा-आधारित फर्म्स को गांधी को पढ़कर और यह देखने की कोशिश करना चाहिए कि वे खुद को स्वामित्व से दूर और ट्रस्टीशिप के सांचे में कैसे ढाल सकती हैं।