अजीत पवार, उप मुख्यमंत्री, महाराष्ट्र
- फोटो : ANI
अजीत पवार एनसीपी के नेता शरद पवार के भतीजे हैं। भाऊ (शरद पवार) के बाद एनसीपी में सबसे मजबूत चेहरा माने जाते थे। पहले स्थिति बहुत मजबूत थी। लेकिन 2019 में 60 घंटे से ज्यादा समय तक भाजपा के साथ जाने के बाद उनकी स्थिति थोड़ी कमजोर हुई थी। अजीत पवार के भाजपा के साथ जाने की एक वजह को शरद पवार के राजनीतिक उत्तराधिकार से जोड़कर देखा जा रहा था। आज भी अजीत पवार के खिलाफ आयकर विभाग की जांच को राजनीति के पंडित उससे जोड़ने से नहीं चूकते। बांद्रा के एक बड़े कांग्रेसी नेता कहते हैं कि इस राजनीतिक खेल में भाजपा का लक्ष्य भी थोड़ा बड़ा है। देखना है कि उसे कितनी कामयाबी मिल पाती है। वह कहते हैं कि शरद पवार को एक प्राइवेट जेट से अमित शाह से मिलन के लिए अहमदाबाद जाना पड़ा था। आखिर कुछ तो वजह रही होगी?
वह ये भी कहते हैं कि देवेन्द्र फडणवीस ने हाल के मामलों में देर से प्रतिक्रिया दी है, वहीं उद्धव ठाकरे बहुत संभलकर चल रहे हैं। कोई तो वजह है? बांद्रा के कांग्रेसी नेता का कहना है कि 2019 में उद्धव मुख्यमंत्री बने थे। तब से अब तक कई बार एनसीपी के भाजपा के साथ जाने और राज्य में नई सरकार के गठन की चर्चा और अफवाह दोनों खूब उठी। हालांकि राजनीतिक स्थिति जस की तस है। वह कहते हैं कि सबकुछ समझने वाली बात है। फिर क्या भाजपा और ऐजेंसियों को अजीत पवार के बारे में आज पता चला है?
एनसीपी के नेता ही क्यों हैं निशाने पर
महाराष्ट्र की सरकार के मुखिया उद्धव ठाकरे हैं। लेकिन उद्धव ठाकरे भी मुख्यमंत्री एनसीपी प्रमुख शरद पवार की इच्छा, दांवपेंच तथा राजनीतिक बल से बने हैं। शिवसेना और एनसीपी की सहयोगी कांग्रेस ने महाराष्ट्र में राज्य सरकार की दशा, दिशा तथा स्थायित्व को शरद पवार के सहारे छोड़ दिया है। शिवसेना के नेता संजय राऊत के बयानों से भी साफ लगता है कि राज्य के सभी राजनीतिक दल शरद पवार के साथ ही राजनीतिक संतुलन बनाने में लगे रहते हैं। भाजपा और एनसीपी दोनों के नेता मानते हैं कि यदि शरद पवार अपना समर्थन वापस ले लें तो उद्धव ठाकरे सरकार कुछ घंटे की मेहमान भर रह जाएगी। दूसरी तरफ शरद पवार के भतीजे अजीत पवार एनसीपी से नाता तोड़ लें तो कुछ समय बाद शरद पवार की पार्टी की ताकत दो तिहाई रह जाएगी। राजनीतिक विश्लेषण में यह भी स्पष्ट है कि अनुभवी शरद पवार की राजनीति पर राजनेता मुश्किल से भरोसा करते हैं। न तो वो पहले की तरह स्वस्थ हैं और न ही उन्होंने अपनी तरह का पार्टी में दूसरा नेता पनपने दिया है। भाजपा को भी उसी शरद पवार से दांव खेलना है, जिनकी राजनीतिक पकड़ के आगे उसे 2019 में सरकार बनाने के बाद भी सत्ता छोड़नी पड़ी थी। भाजपा के नेताओं को पता है कि जब तक यह चलता रहेगा, तब तक शिवसेना और कांग्रेस राजनीति के पैमाने पर भाजपा और एनसीपी के बाद गिनी जाती रहेंगी। शरद पवार भी महाराष्ट्र में घिरे रहेंगे। ऐसा दिखाई भी देता है। शरद पवार जहां केंद्र की भाजपा सरकार और प्रधानमंत्री के खिलाफ रह-रहकर अपनी नाराजगी दिखाते हैं, वहीं शिवसेना के संजय राऊत भी 2024 में केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सहयोगी सरकार बनने का दावा कर देते हैं।
देवेंद्र फडणवीस, नेता भाजपा
- फोटो : ANI
शिवसेना और एनसीपी के नेताओं का आरोप है कि भाजपा महाराष्ट्र सरकार के खिलाफ षडयंत्र बुन रही है। इसका उद्देश्य राज्य सरकार को कमजोर करना है। बताते हैं कि भाजपा के केंद्रीय नेता 2019 में स्थायी सरकार न दे पाने का जख्म भुला नहीं पा रहे हैं। जो कुछ चल रहा है, उसमें भाजपा के केन्द्रीय नेताओं की काफी बड़ी भूमिका है।
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने दीपावली के बाद एनसीपी के मंत्री नवाब मलिक को लेकर बड़ा खुलासा करने का दावा किया है। फडणवीस के खुलासा करने से पहले उनकी पत्नी अमृता फडणवीस पर निशाना साधते हुए नवाब मलिक ने राजनीतिक बम फोड़ दिया है। अमृता फडणवीस कोई पहली बार निशाने पर नहीं आई हैं। इसके पहले भी उनपर आरोप लगे हैं। इस बार की राजनीतिक लड़ाई गोवा में नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो की कार्रवाई के बाद शुरू हुई है। इसमें फिल्म अभिनेता शाहरुख खान के बेटे आर्यन एनसीबी की भेंट चढ़ गए हैं। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के इस छापे और एनसीबी के डायरेक्टर समीर वानखेड़े की इसके पीछे मंशा को लेकर नवाब मलिक ने लगातार सवालों, आरोपों की झड़ी लगा दी है। उनके कुछ आरोप और सवालों ने समीर वानखेड़े को तंग कर रखा है। जवाब में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने वानखेड़े की सुरक्षा चिंताओं को देखते हुए उन्हें जेड प्लस कैटेगरी की सुरक्षा दे दी है। एनसीपी, शिवसेना और कांग्रेस के नेता इसे भाजपा के इशारे पर लिया गया टर्निंग प्वाइंट वाला फैसला बता रहे हैं।
क्या कोई राजनीतिक धमाका होगा?
फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की असामयिक मृत्यु का प्रकरण याद रखना होगा। मुंबई के तत्कालीन पुलिस कमिश्नर परमवीर सिंह की तब कुर्सी जाते-जाते बची थी। कुछ महीने बाद दूसरी घटनी हो गई। उद्योगपति मुकेश अंबानी को धमकी देने और मनसुख हिरेन की हत्या के मामले में पुलिस अधिकारी सचिन वझे पर शिकंजा कस गया। इसी मामले में धन उगाही और इसके तार मुंबई पुलिस कमिश्नर परमवीर सिंह से होते हुए गृह मंत्री अनिल देशमुख तक जा जुड़े। नतीजा सामने है। गृहमंत्री अनिल देशमुख गिरफ्तार हो चुके हैं। पूर्व कमिश्नर परमबीर सिंह पर भी जांच पड़ताल की तलवार लटकी हुई है। राजनीतिक गलियारे के सूत्र बताते हैं कि ताजा मामला उससे कहीं बड़ा है। यहां भी कोई न कोई नतीजा निकलेगा और इसका असर महाराष्ट्र की राजनीति से लेकर राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ना तय है।