महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव को देखते हुए महाराष्ट्र कांग्रेस ने भारतीय चुनाव आयोग से एक बार फिर डीजीपी रश्मि शुक्ला के सेवा विस्तार की समीक्षा करने की मांग की है। कांग्रेस ने कहा कि उनकी नियुक्ति राजनीति से प्रेरित है और इससे चुनाव प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
महाराष्ट्र कांग्रेस के अध्यक्ष नाना पटोले ने लगातार दूसरी बार इस मांग को लेकर चुनाव आयोग को पत्र लिखा है। पटोले ने कहा कि डीजीपी शुक्ला को दिया गया दो साल का सेवा विस्तार महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम का उल्लंघन है। कांग्रेस ने कहा कि शुक्ला को जनवरी 2024 में डीजीपी नियुक्त किया गया था। कांग्रेस के अनुसार शुक्ला 30 जून 2024 को सेवानिवृत्त होने वाली थीं। इसके बाद उनको जनवरी 2026 तक सेवा विस्तार दे दिया गया।
पटोले ने कहा कि डीजीपी रश्मि शुक्ला को संभावित विधानसभा चुनावों के इतने करीब समय में दिया गया सेवा विस्तार संदेह पैदा करता है। विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि यह फैसला राजनीति से प्रेरित है, जो संभावित रूप से चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित कर रहा है। पटोले ने चुनाव आयोग से तत्काल कार्रवाई करने और शुक्ला की नियुक्ति और विस्तार की समीक्षा करने का आग्रह किया।
पटोले ने कहा कि सेवा विस्तार की समीक्षा न केवल महाराष्ट्र के पुलिस बल की अखंडता के लिए बल्कि पूरे भारत में पुलिस प्रशासन के भविष्य के लिए भी आवश्यक है। उन्होंने आरोप लगाया कि शुक्ला को दिया गया सेवा विस्तार सरकारी कार्यों की निष्पक्षता को कम करता है।
नाना पटोले कहा कि रश्मि शुक्ला के कार्यकाल को उनकी मूल सेवानिवृत्ति तिथि से आगे बढ़ाना महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम का स्पष्ट उल्लंघन है, जो डीजीपी के लिए दो साल के कार्यकाल को अनिवार्य करता है। बशर्ते कि इस अवधि के दौरान उनकी सेवानिवृत्ति न हो। उनका कार्यकाल बढ़ाकर सरकार ने नियम का उल्लंघन किया है। इससे कानून के पालन के बारे में चिंताएं बढ़ गईं हैं।
उन्होंने आगे कहा कि सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह फैसले का हवाला देकर सेवा विस्तार को सही ठहराने की राज्य सरकार की दलील भ्रामक है। कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि इस खतरनाक कदम का पूरे भारत में असर हो सकता है क्योंकि यह यूपीएससी के स्थापित मानदंडों को दरकिनार कर रहा है।
महाराष्ट्र कांग्रेस प्रमुख ने यह भी कहा कि रश्मि शुक्ला के कार्यकाल को बढ़ाने की प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव है। इससे सरकार की मंशा पर सवाल उठ रहे हैं। साफ लगता है कि निर्णय जल्दबाजी में लिया गया है। इसमें कानूनी मानकों और सार्वजनिक जवाबदेही पर विचार नहीं किया गया।