सॉफ्टवेयर इंजीनियर किरण पंडित कहते हैं कि वह उन लोगों को वोट देंगे, जो उनका भला करेगा। जाति, धर्म, मंदिर-मस्जिद के नाम पर वोट मांगने वालों से वह हाथ जोड़ते हैं। उनका कहना है कि इससे न तो देश का विकास होने वाला है और न ही युवाओं को रोजगार मिलने वाला है। किरण कहते हैं कि राम मंदिर अपनी जगह ठीक है। लेकिन उनकी मांग तो अपने नासिक शहर में जाम से निजात दिलाने के लिए मेट्रो के शुरू होने की है। वह कहते हैं कि न जाने कब से चर्चा हो रही है कि यहां पर मेट्रो शुरू हो जाएगी। लेकिन न तो अब तक मेट्रो शुरू हुई और न ही यहां पर आईटी पार्क डेवलप हआ। किरण कहते हैं कि अगर यहां पर मूलभूत सुविधाएं खासतौर से युवाओं को रोजगार संबंधी इनफॉरमेशन टेक्नोलॉजी पार्क तैयार हो जाए, तो वह नासिक से पुणे, दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु क्यों जाएं। किरण कहते हैं कि नेताओं और राजनीतिक दलों को जाति-धर्म-मजहब से ऊपर उठकर युवाओं के लिहाज से मुद्दे तैयार करने चाहिए और इस आधार पर उनसे बात करनी चाहिए।
नासिक में ही नौकरी करने वाले योगेश कुमार कहते हैं कि सियासत तो ठीक है, लेकिन सियासत में विकास का होना बेहद जरूरी है। योगेश कहते हैं कि इसमें कोई शक नहीं है कि हमारे देश की अर्थव्यवस्था मजबूती के साथ आगे बढ़ रही है। दुनिया के नक्शे पर हमारी ताकत पहचानी जा रही है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि हमारे यहां रोजगार कितना है। नेताओं ने जो युवाओं के लिए वादे किए हैं, उनको तो हर हाल में पूरा किया जाना चाहिए। सरकार को और जिम्मेदार लोगों को इस बात का अहसास होना चाहिए कि अभी भी हमारे देश का युवा खूब बेरोजगार है। इसलिए उनकी इस जरूरत को पूरा करने के लिए ही पूरा खाका खींचा जाए, तो ज्यादा बेहतर है। महाराष्ट्र की सियासत में राजनीतिक दलों में मची खींचतान पर योगेश कहते हैं कि
महाराष्ट्र की राजनीति में जिस तरीके से बीते कुछ समय में घटित हो रहा है, वह पूरी तरह सत्ता पाने की सियासत ही है।
ग्राफिक डिजाइनर हितेश कहते हैं कि विकास तो हो रहा है। इस शहर में भी वह सब होगा जो अन्य शहरों में है। वक्त लग रहा है लेकिन जिस तरीके से शहर में काम चल रहा है उससे उम्मीद है जल्द ही नासिक के लोगों को पुणे, मुंबई, दिल्ली जैसी सुविधाएं भी मिलेंगी। वह कहते हैं कि यहां पर जिस तरीके से काफी वक्त से आईटी पार्क की मांग की जा रही थी, ताकि इस फील्ड से जुड़े लोगों को रोजगार मिल सके, वह भी जल्दी ही पूरा हो जाएगा। नासिक में ही फैशन डिजाइनिंग की पढ़ाई कर रहीं निकिता कहती हैं कि वैसे तो उनका शहर कई मामलों में बहुत आगे है। लेकिन यह तय है कि जब वह पढ़ाई करके निकलेंगें तो उनके लिए नया शहर ही रोजी-रोटी का ठिकाना बनेगा। क्योंकि यहां पर अभी भी नई विधाओं में संभावनाओं के दरवाजे नहीं खुले हैं।
यहां रहने वाले संजीव कहते हैं कि बीते कई सालों से वह यही सुनते आ रहे हैं कि मेट्रो भी आ जाएगी और आईटी पार्क भी आ जाएगा। लेकिन न मेट्रो आई है और न ही आईटी पार्क आया है। नतीजा यह है कि यहां के लोगों को अपनी जरूरतों के लिए पुणे का चक्कर लगाना पड़ता है। जबकि नौकरी के लिए दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और पुणे जाना पड़ता है। वह कहते हैं कि जब चुनाव आता है, तो नेता लगातार ऐसे ही वादे करते हैं, जिसमें उनका सुनहरा भविष्य दिखता है। संजीव कहते हैं कि सुनहरे भविष्य के फायदे तो बेहतर है, लेकिन अगर वह जमीन पर उतरे, तो उससे युवाओं का भी भला होगा और शहर का भी विकास होगा।