चाहे लोकसभा के चुनाव हों या फिर विधानसभा के चुनाव, तारीख नजदीक आने के कुछ महीने पहले मायावती के सचिवालय में सरगर्मी बहुत बढ़ जाती थी। अब वो बात नहीं है। बसपा के एक पुराने नेता कहते हैं कि टिकट मांगने वालों की लाइन तो तभी लगती है, जब राजनीति का बाजार चढ़ा हो। इस समय मायावती के सचिवालय में मेवा लाल गौतम जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। पार्टी महासचिव भी हैं। मेवा लाल गौतम हर रोज बसपा प्रमुख का सोशल मीडिया पर संदेश प्रसारित कर देते हैं। बसपा के एक मौजूदा सांसद को भी लोकसभा चुनाव में पार्टी के भावी रणनीति का इंतजार है और चिंता भी।
सूत्र का कहना है कि 2019 में चुनाव जीत गए थे, लेकिन 2024 में चुनाव लड़ने का आत्मबल नहीं बन पा रहा है। पूर्वांचल के सांसद का कहना है कि केवल बसपा के मूल वोटों के बैंक से लोकसभा चुनाव जीतना मुश्किल है। इसके लिए बसपा को तीन-चार प्रतिशत अन्य बिरादरी के मतों की जरूरत पड़ती है।
बसपा के नेता का कहना है कि अभी यह तीन-चार प्रतिशत अतिरिक्त वोटों का गणित नहीं समझ में आ रहा है। कांग्रेस, सपा और रालोद के साथ गठबंधन के बारे में सूत्र का कहना है कि यह फैसला तो बसपा प्रमुख को लेना है। मुझे नहीं पता कि वह इस बारे में क्या करने जा रही हैं। 15 जनवरी को बसपा प्रमुख मायावती का जन्मदिन है। मुझे भी इस दिन का इंतजार है।
अभी बसपा की ताकत कितनी बची है?
लोकसभा चुनाव 2019 में बसपा को उ.प्र. में 19.3 प्रतिशत वोट मिले थे। पूरे देश में यह वोट प्रतिशत 3.67 प्रतिशत (2014 के लोकसभा चुनाव से 0.53 प्रतिशत कम वोट) था। यानी राज्य के तीसरे नंबर की पार्टी थी। 2022 के विधानसभा चुनाव में यह वोट 12.88 प्रतिशत था। 2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा को सपा और रालोद के साथ गठबंधन में 10 सीटें मिली थीं।
2022 में पार्टी ने अकेले चुनाव लड़ा और सिर्फ एक सीट जीत सकी थी। उ.प्र. विधान परिषद में बसपा का एक सदस्य है और उसका भी कार्यकाल समाप्त हो रहा है। उत्तराखंड विधानसभा में बसपा का एक सदस्य, राजस्थान में 02 और पंजाब विधानसभा में एक सदस्य है। मैजूदा समय में उसके लोकसभा में 08 सदस्य और देश भर की विधानसभाओं में 5 सदस्य भर हैं।
इससे पहले 2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा को पूरे देश में 4.2 प्रतिशत वोट मिले थे। भाजपा और कांग्रेस के बाद बसपा वोट के मामले में देश की तीसरी बड़ी पार्टी थी। लेकिन बसपा को लोकसभा की एक भी सीट नहीं मिली थी। जबकि मायावती उ.प्र. की चार बार (12वीं,13वीं,14वी और 15 वीं विधानसभा) मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। उनका आखिरी कार्यकाल 2007-2012 का और राज्य की पूर्ण बहुमत की सरकार का था।
बसपा का यह वोट प्रतिशत पूरे देश में 1996 के लोकसभा चुनाव से तेजी से बढ़ा (1.61 से सीधे 4.2)। 2009 में यह सबसे अधिक 06.17 प्रतिशत था, लेकिन इसके बाद से गिरना शुरू हुआ। इसी तरह से उ.प्र. विधानसभा चुनाव में 2007 में सबसे अधिक 30.17 प्रतिशत वोट मिले थे। 2022 से तुलना करें तो यह वोट प्रतिशत 17.29 प्रतिशत तक गिर चुका है।
मायावती की मजबूरी, आखिर क्यों गठबंधन है जरूरी?
चुनावी गणित और प्रचार अभियान पर काम कर रहे प्रशांत कुमार कहते हैं कि मायावती के पास अब आखिर बचा क्या है? प्रशांत कहते हैं कि बसपा इस बार लोकसभा चुनाव में अगर अकेले उतरती हैं तो उनके सीटें जीत पाने की संभावना 2014 के चुनाव जैसी है। बहुत हद तक संभव है कि उसके वोटों में भी 1-1.5 प्रतिशत तक की गिरावट देखने को मिले। बसपा के पास दूसरी चुनौती भी है। मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को अपने उत्तराधिकारी और मुख्य भूमिका में लांच किया है।
प्रशांत कुमार कहते हैं कि बसपा ही एकमात्र पार्टी है जिसके पास अपना वोट गठबंधन के दलों के पास स्थानांतरित करने की क्षमता है। दूसरे दलों में यह क्षमता काफी कम है। इसलिए उ.प्र. के राजनीतिक दल उससे गठबंधन करने के इच्छुक रहते हैं। प्रशांत कहते हैं कि यदि दूसरे दलों या जातियों के मतदाताओं का वोट बसपा के साथ जुड़ जाए तो उसके सीटों की संख्या ठीक ठाक बढ़ जाती है। इसलिए अब मायावती की पार्टी को भी उ.प्र. में गठबंधन की खास जरूरत बनती जा रही है।
सुशील कुमार दूबे समाजवादी पार्टी के सचिव हैं। जमीनी नेता हैं। सुशील कुमार दूबे कहते हैं कि गठबंधन करना या न करना मायावती और उनकी पार्टी के विवेक पर निर्भर है। हमारे अध्यक्ष अखिलेश यादव मायावती का सम्मान करते हैं। कल उन्होंने अपनी राय रख दी है। दूबे कहते हैं कि इंडिया गठबंधन में मायावती आना चाहें तो इसमें बुरा क्या है? इससे तो विपक्ष की ताकत ही बढ़ेगी। इसलिए बसपा का स्वागत है।
संजय गांधी के जमाने के कांग्रेसी प्रदीप पाठक कहते हैं कि उ.प्र. के राजनीतिक गणित को समझने की कोशिश कीजिए। बसपा के भाजपा के साथ जाने की संभावना न के बराबर है। भाजपा उ.प्र. में 2024 में 70 सीटों को जीतने का सपना देख रही है। पूरे देश में उसने 400 से अधिक लोकसभा सीटों का लक्ष्य रखा है। इसमें बसपा को कहां जगह मिलने वाली है। इसलिए बसपा भी नहीं चाहेगी वह लगातार कमजोर होती चली जाए। पाठक कहते हैं कि बसपा में संजीवनी लाने का एकमात्र तरीका यही है कि वह भी इंडिया गठबंधन में शामिल हो।