कोरोनाकाल में इस संगठन के कई सदस्यों के परिजन भी संक्रमण की चपेट में आ गए। इसके बावजूद कोरोना वायरस से ग्रसित लोगों की मदद के लिए 130 युवाओं की एक विशेष टोली तैयार हो गई। अप्रैल में इस टोली ने अपना काम शुरु कर दिया। बतौर अनुपम, चूंकि हमारे पास कोई संसाधन नहीं था।
आखिर हम इसी देश के वासी हैं। हमारी आंखों के सामने लोग दम तोड़ रहे हैं। श्मशान घाटों के बाहर एक लंबी लाइन में शव रखे हुए हैं। सरकारी नौकरी लेने के लिए दिन-रात मेहनत करने वाले युवा साथ आ गए। बैठक हुई और यह तय कर लिया गया कि चाहे जो भी हो, लोगों की हर संभव मदद की जाएगी।
टोली ने तैयार किया ये प्रबंधन और आगे बढ़ती चली गई
युवा हल्लाबोल के राष्ट्रीय संयोजक अनुपम के अनुसार, टोली ने सबसे पहले कोरोना के मरीजों से बात कर यह पता लगाया कि संसाधनों के मामले में आखिर दिक्कत क्या है और कहां पर है। इसके बाद काम शुरु कर दिया गया। विभिन्न टीमें गठित कर दी गई। प्लाज्मा, दवा या इंजेक्शन, ऑक्सीजन, आईसीयू बेड और टेस्टिंग प्रक्रिया के लिए अलग-अलग पांच टोली बनाई।
चूंकि विभिन्न माध्यमों के जरिए मदद के लिए कॉल आ रही थी, इसलिए ऐसा तंत्र बनाया गया कि उन सभी लोगों तक मदद पहुंच जाए। क्विक रिस्पांस टीम का गठन किया गया। ट्वीटर, इंस्टाग्राम और पर्सनल ग्रुप की आईडी भी सार्वजनिक कर दी गई। इन टोलियों के लिए रोस्टर तैयार किया गया। इसके ऊपर पांच इंचार्ज नियुक्त किए गए। वे यह देखते हैं कि किसी मरीज की कॉल आते ही वह त्वरित गति से संबंधित टोली के पास पहुंची है या नहीं। यह टीम उस प्रार्थना को संबंधित टोली को असाइन कर देती है।
मरीज जैसे ही अपनी जरुरत बताता है कि उसे क्या चाहिए, टोली सक्रिय हो जाती है। जैसे किसी को बेड नहीं मिल रहा है या ऑक्सीजन सप्लाई में दिक्कत है। इसके लिए संबंधित अस्पताल या कंपनी के एमडी को प्रार्थना के भाव में फोन किया जाता है। उन्हें मरीज की हालत बताई जाती है। वहां से समस्या हल नहीं होती तो ऑक्सीजन कंटेनर या सिलेंडर भेजने वाली कंपनी से संपर्क किया जाता है। कई बार यह होता है कि कंपनी में एक दो टैंकर साथ निकल जाते हैं, बाकी का नंबर काफी देर में आता है।
ऐसे में कंपनी के प्रतिनिधि से प्रार्थना की जाती है कि वह फलां नंबर वाले टैंकर को जल्द रवाना कर दें। एक ऐसी टोली भी है, जिसने अधिकांश राज्यों के ऐसे अस्पतालों की सूची तैयार की है, जहां पर आईसीयू या सामान्य बेड खाली हैं। मरीजों को फोन पर बता दिया जाता है कि वे बिना किसी देरी के यहां पहुंच जाएं। एंबुलेंस सेवा मुहैया कराने का भी प्रयास किया जाता है।
24 घंटे चलती रहती है ये खास मुहिम
खास बात ये है कि युवा हल्लाबोल की टोली 24 घंटे काम करती हैं। एक टॉप लेवल की छोटी टोली भी है। वह ये देखती है कि अगर किसी टोली का कोई सदस्य दूसरे काम में व्यस्त है तो उसकी जगह वह खुद जिम्मेदारी संभाल लेती है। इस टोली के पास पर्याप्त संख्या में वेंडर के नंबर मौजूद रहते हैं।
इसके अलावा उन मेडिकल स्टोर और एजेंसियों के एड्रेस भी टोली अपने पास रखती है, जहां से दवा और इंजेक्शन सरकारी रेट पर आसानी से मिल जाता है। किसी दूसरे राज्य में मदद के लिए टोली, अपने युवा हल्लाबोल के दूसरे साथियों की मदद लेती है। जब टोली के सदस्य किसी को मदद के लिए फोन करते हैं तो उनके बीच एक भावनात्मक रिश्ता बन जाता है।
अनुपम बताते हैं कि कई बार साथियों की आंखें नम हो जाती हैं जब वे किसी से मदद मांगते हैं। एक तरफ मदद देने वाला है और दूसरी तरफ एक ऐसा मरीज, जिसे बेड नहीं मिल पाया और वह ऑक्सीजन सिलेंडर के इंतजार में अंतिम अवस्था तक पहुंच जाता है। ऐसे केस में प्रार्थना की जाती है। सामने वाला व्यक्ति भी समझ जाता है कि वाकई ये मानवता को झकझोर देने वाला केस है। वह तुरंत ऑक्सीजन सिलिंडर मुहैया करा देता है। कुछ मामलों में तो रात को भी इस तरह की मदद पहुंचाई गई हैं।
मान लीजिये किसी टोली के सदस्य ने कोई मैसेज नहीं देखा और उस कॉलम में ओके आदि नहीं लिखा गया तो उसका तुरंत पता लग जाता है। कोर टीम के सदस्यों को यह पता चल जाता है कि किसी कारणवश संबंधित टीम के सदस्य ने मैसेज नहीं देखा है। वे वहीं से उस प्रार्थना को संबंधित ग्रुप में डाल देते हैं। 30 मिनट के बाद फॉलोअप ले लिया जाता है। एक ऐसी टोली भी है, जिसका काम केवल सूचनाएं एकत्रित करना एवं उन्हें अपडेट करते रहना है।
यहां पर राज्यों के अस्पताल, ऑक्सीजन सप्लायर, मेडिकल एजेंसी और प्लाज्मा डोनर आदि की जानकारी आती रहती है। कोर टीम का लिंक हर टोली के साथ रहता है। इनके अलावा रेस्पोंस ट्रैकिंग टीम भी अपना काम करती है। कौन-सी टोली को कब और क्या काम अलॉट हुआ था, मरीज को मदद कब मिली, ऐसी बातों का ब्यौरा इसी टीम के पास रहता है।
एक्सेल सीट पर एंट्री और टोकन नंबर जनरेट करना, जैसे कामों पर यह टीम नजर रखती है। साथ ही क्षेत्रवार एक एक्टिविस्ट की ड्यूटी लगाई गई है। वह अपने राज्य में एक समन्वयक का काम करता है। जैसे जिले के डीएम या गृह सचिव, स्वास्थ्य सचिव एवं दूसरे किसी आला अधिकारी से बात करनी है तो वह समन्वयक इस जिम्मेदारी का निर्वहन करता है। राष्ट्रीय संयोजक अनुपम एवं उनकी टीम के वरिष्ठ सदस्य, राज्यों के मंत्रियों से बात कर मरीज की मदद करते हैं।