केंद्र सरकार राष्ट्रीय भूमि मुद्रीकरण निगम स्थापित करने पर गंभीरतापूर्वक विचार कर रही है। इस निगम के पास केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों, निगमों और विभागों के पास पड़ी अतिरिक्त अनुपयोगी भूमि को कमाऊ बनाने की जिम्मेदारी होगी। माना जा रहा है कि इस निगम के पास मंत्रालयों के पास पड़ी अतिरिक्त भूमि को बेचने, व्यावसायिक-आवासीय संपत्तियां विकसित कर उन्हें किराए पर देने, या कुछ को लीज पर प्राइवेट सेक्टर को देने की जिम्मेदारी हो सकती है।
लेकिन श्रमिक संगठनों के नेताओं ने केंद्र के इस प्लान की कड़ी आलोचना की है। इन नेताओं का कहना है कि निगमों के निजीकरण में कर्मचारियों के भारी विरोध का सामना करना पड़ रहा है, जिससे बचने के लिए सरकार यह बैकडोर का रास्ता तलाश रही है। नेताओं को आशंका है कि जब मंत्रालयों-विभागों या निगमों के पास कोई अतिरिक्त भूमि या संपत्ति नहीं रह जाएगी, तब घाटा दिखाकर उन्हें निजी हाथों में बेचने का रास्ता तैयार हो जाएगा।
एटक की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य सी. श्रीकुमार ने कहा कि केंद्र सरकार रक्षा क्षेत्र, खाद उत्पादक निगमों, रेल, एलआईसी और अन्य क्षेत्रों के निगमों का निजीकरण करने की कोशिश कर रही है। लेकिन इसके लिए उसे कर्मचारियों के भारी विरोध का सामना करना पड़ रहा है, जिससे वह इन्हें सीधे निजी हाथों में नहीं सौंप पा रही है। इसीलिए धीरे-धीरे पहले निगमों की संपत्तियों को बेचकर या किराए पर देकर उन्हें कमजोर करने की रणनीति अपनाई जा रही है। जब इन निगमों के पास भूमि या अन्य संपत्ति नहीं रह जाएगी, तब इन्हें घाटे का सौदा बताकर इनके बेचने का रास्ता बना लिया जाएगा. उन्होंने कहा कि श्रमिक संगठन सरकार की इस कोशिश का पुरजोर विरोध करेंगे।
पीपुल फर्स्ट के ज्वाइंट कन्वेनर थॉमस फ्रैंको ने कहा कि केंद्र सरकार ने निगमों को निजी हाथों में सौंपकर भारी धनराशि एकत्र करने की योजना बनाई थी। लेकिन निजीकरण के भारी विरोध के कारण उसकी यह योजना पूरी तरह कामयाब नहीं हो रही है, इसीलिए इस तरह का रास्ता तैयार कर संपत्तियों को निजी हाथों में देने का रास्ता तैयार किया जा रहा है।
फ्रैंको ने कहा कि सरकार यह बता देती है कि वह संपत्तियों का केवल मुद्रीकरण कर रही है, वह उन्हें बेच नहीं रही है, और किराए या लीज पर देने से सरकार को आय प्राप्त होगी। उन्होंने कहा कि, लेकिन यदि बेहद कम कीमत पर किसी कंपनी को कोई भूमि 99 साल के रेंट पर देने का समझौता कर लिया जाता है तो यह भी संपत्तियों को बेचने जैसा ही होगा। इस दौरान निगमों के पास कमाई न होने का आधार दिखाकर सरकार उन्हें बेचने का रास्ता भी तैयार कर लेगी। इसलिए श्रमिक सरकार के इस कदम का विरोध करेंगे।