केशूभाई पटेल को हटाकर जब 2001 में नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री बनाया गया तब तक वह कोई भी चुनाव नहीं लड़े थे और उन्हें संगठन का अनुभव तो था, लेकिन सरकार चलाने का भी कोई अनुभव नहीं था। उन्हें वहां भाजपा के तत्कालीन दिग्गज नेताओं के भितरघातों और विरोधों का भी सामना करना पड़ा। इसके बावजूद नरेंद्र मोदी न पीछे मुड़कर नहीं देखा और न सिर्फ उन्होंने गुजरात में भाजपा को अजेय बनाया, बल्कि 2014 के बाद देश में भाजपा को जिस ऊंचाई पर पहुंचाया है वह सबके सामने है।
लेकिन 2017 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने जिस तरह की कड़ी चुनौती भाजपा को दी थी और किस तरह मोदी ने खुद सारी ताकत झोंक कर पार्टी को हारते-हारते बचाकर बमुश्किल सरकार बनने लायक सीटें दिलवाई थीं, उसे नरेंद्र मोदी भूले नहीं हैं। विजय रूपाणी की आगुआई में हुए इन चुनावों में भाजपा का ग्राफ बुरी तरह नीचे आने के बावजूद उन्हें फिर मुख्यमंत्री महज इसलिए बनाया गया क्योंकि रूपाणी को तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का बेहद भरोसा हासिल था।
लेकिन पिछले करीब चार साल में रूपाणी की सरकार कोविड प्रबंधन से लेकर अनेक मोर्चों पर उन अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरी जो मानदंड नरेंद्र मोदी ने बतौर मुख्यमंत्री स्थापित किए थे। इसलिए रूपाणी को बदले जाने की बात बीते साल से ही शुरू हो गई थी, लेकिन शाह का वरदहस्त उनका कवच बना रहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी निजी रिश्तों को बहुत अहमियत देते हैं, लेकिन उनसे भी ऊपर उनके लिए पार्टी और राजनीतिक उद्देश्य हैं। उन पर वह कोई समझौता नहीं करते।
भाजपा के ही सूत्र बताते हैं कि गुजरात से आने वाली खबरें उन्हें परेशान कर रही थीं। मोदी भले ही देश के प्रधानमंत्री हों लेकिन गुजरातियों के लिए वो आज भी नरेंद्र भाई ही हैं और सरकारी तंत्र और पार्टी सगंठन के अलावा भी गुजरात की जानकारी जुटाने के उनके अपने अनेक स्रोत और चैनल हैं। इनके जरिए और संगठन तंत्र के जरिए मिलने वाली जानकारी के बाद उन्होंने गुजरात में नेतृत्व परिवर्तन का मन तो बना लिया था।
उन्होंने इसके लिए गृह मंत्री अमित शाह को भी राजी कर लिया। लेकिन लाया किसे जाए यह एक बड़ा सवाल था। राज्य सरकार और संगठन में जिस कदर ऊपर से नीचे तक गुटबाजी है, उसे देखते हुए गुजरात के किसी जाने पहचाने चेहरे को मुख्यमंत्री बनाने से पार्टी संगठन की गुटबाजी घटने की बजाय बढ़ने की आशंका ज्यादा थी।
इधर राज्य की राजनीति से सक्रिय रूप से दूर हो चुकीं आनंदी बेन पटेल का खेमा भी लगातार नेतृत्व परिवर्तन का दबाव अपने तरीके से बना रहा था। गुजरात भाजपा सूत्रों के मुताबिक पिछले महीने से लेकर अब तक खुद आनंदी बेन दो बार अहमदाबाद आकर अपने समर्थकों के साथ बातचीत कर चुकी हैं। आनंदी बेन जो गुजरात की नरेंद्र मोदी सरकार में ताकतवर मंत्री रही हैं और उन्हें प्रधानमंत्री का भरोसा भी हासिल है।
बदलाव की इस कवायद में उन्होंने बेहद खामोशी से अपने वफादार भूपेंद्र पटेल का नाम बढ़ाया, जो 2017 के चुनाव में पहली बार उस घाट लोदिया विधानसभा क्षेत्र से पहली बार विजयी हुए थे। यह आनंदी बेन पटेल की अपनी सीट हुआ करती थी। भूपेंद्र पटेल की उपलब्धि यही थी कि उन्हें चुनाव में एक लाख सत्रह हजार वोटों की जबरदस्त बढ़त मिली थी, जो राज्य में सबसे ज्यादा थी।
बेन को अच्छी तरह से पता था कि मोदी नए चेहरों को आगे बढ़ाने में ज्यादा विश्वास रखते हैं और इस तरह से वह पार्टी संगठन को न सिर्फ पुराने नेताओं के आग्रहों और पूर्वाग्रहों से मुक्त करते हैं बल्कि नेतृत्व की नई पांत भी तैयार करते हैं। इसकी झलक उनकी गुजरात से लेकर केंद्र सरकार तक में मंत्रियों की नियुक्ति से लेकर राज्यपालों और मुख्यमंत्रियों की नियुक्ति तक में दिखाई देती है।
2014 के बाद भाजपा ने जितने भी राज्यों में चुनाव जीतकर अपनी सरकार बनाई वहां पुराने स्थापित नेताओं को दरकिनार करके नए चेहरों को ही कमान दी गई। हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर, महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस, झारखंड में रघुबरदास, हिमाचल प्रदेश में जयराम ठाकुर, उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ, उत्तराखंड में पहले त्रिवेंद्र सिंह रावत, फिर तीरथ सिंह रावत और अब पुष्कर सिंह धामी, असम में पहले सर्वानंद सोनोवाल और अब हिमंतो विश्वसर्मा, कर्नाटक में बसवराज बोम्मई इसके उदाहरण हैं।
इसलिए आनंदीबेन पटेल के वफादार भूपेंद्र पटेल का नाम मोदी को जंच गया, क्योंकि यह नाम न सिर्फ नया था, बल्कि राजनीति की पहली पारी होने के कारण इसके पीछे किसी तरह का विवाद या आरोप भी नहीं है। इसके साथ ही पटेल के पाटीदार होने की वजह से राज्य के सबसे ताकतवर पाटीदार समाज की भावनाओं को भी संतुष्ट किया जा सकता है, जो आनंदीबेन पटेल को हटाए जाने के समय से ही खफा है।
वहीं कांग्रेस से ज्यादा अब आम आदमी पार्टी उसे लुभाने में जुटी है। हालांकि पाटीदार समाज के प्रभावशाली नेताओं की भाजपा में कमी नहीं है। उनमें प्रमुख नाम केंद्रीय मंत्री पुरुषोत्तम रूपाला, मनसुख मांडविया, आरसी फालदू, उप मुख्यमंत्री नितिन पटेल, राज्य के पूर्व गृह राज्य मंत्री गोवर्धन झडफिया की दावेदारी की भी चर्चा हुई। लेकिन इन सबकी अपेक्षा भूपेंद्र पटेल का नाम इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा नेतृत्व को पसंद आया कि इससे राज्य की राजनीति का सत्ता संतुलन भी बदलेगा।
साथ ही केंद्र सरकार खासकर प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों और कार्यक्रमों को ज्यादा प्रभावशाली तरीके से लागू करवाया जा सकेगा। कुल मिलाकर गुजरात में सत्ता बदल और भूपेंद्र पटेल को कमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सियासी मास्टर स्ट्रोक है, जो पार्टी के बाहर और भीतर कई दिग्गजों को असहज करेगा और गुजरात की राजनीति से अधिकारिक रूप से बाहर हो चुकी आनंदी बेन पटेल राज्य से बाहर रहते हुए भी सत्ता का नया और अघोषित केंद्र बन सकती हैं।