इस महागठबंधन में केवल वही पार्टियां शरीक हुईं जो कश्मीर को वहां के लोगों के अनुसार जनमत संग्रह कराकर एक अलग पहचान दिलाना चाहते थे। हालांकि इनके मंसूबे पाक को लेकर काफी नरम रहे। ये सभी कई मौकों पर भारत की अपेक्षा पाक से अपनी नजदीकियां दिखाते रहे हैं। 90 के दशक में जब घाटी में आतंकवाद चरम पर था तब इन्होंने खुद को वहां एक राजनैतिक चेहरा बनने की कोशिश की लेकिन लोगों ने इसे नकार दिया था।
इनका कहना था कि ये स्थानीय लोगों के मन की बात को सामने लाने का काम कर रहे हैं लेकिन इनके पाक अधिकृत कश्मीर पर कोई राय नहीं है। इनके उपर आरोप है कि ये विदेशों से धन लेकर घाटी में अलगाववादी विचारधारा को बढ़ाते हैं। इनके कई नेताओं पर देश विरोधी कार्यों में शामिल होने के आरोप हैं।
हुर्रियत में ही एक राय नहीं
कश्मीर के मसले पर हुर्रियत कांफ्रेंस में ही एक राय नहीं है। इसमें शामिल कुछ नेता कश्मीर को भारत से अलग कर नया देश बनाने के सपने देखते हैं जबकि कुछ तो इससे भी आगे जाकर कश्मीर को पाकिस्तान में शामिल कराना चाहते हैं। जबकि, एक धड़ा ऐसा भी है जो कश्मीर को और अधिक स्वायत्ता देने की मांग करता है।
कई मौकों पर यह बात सामने आई है कि इन अलगाववादी नेताओं के संबंध घाटी में सक्रिय चरमपंथ से रहा है। इसके कई सदस्य तो ऐसे भी हैं जो पूर्व में आतंकवादी भी रहे हैं।
अलग है हुर्रियत का संविधान
ये कहते हैं कि हुर्रियत कांफ्रेंस एक सामाजिक, धार्मिक और राजनैतिक संगठन है जो जम्मू कश्मीर के लोगों के बीच रहकर संयुक्त राष्ट्र संघ के मुताबिक घाटी में शांतिपूर्ण संघर्ष को बढ़ावा देने का काम करेगा जिससे यहां के लोगों को आजादी मिल सके। यह भारत, पाकिस्तान और जम्मू-कश्मीर के लोगों के साथ मिलकर एक वैकल्पिक हल निकालने की कोशिश करेगी।
कई बार टूट चुकी है हुर्रियत
हुर्रियत कांफ्रेंस स्थापना के बाद कई बार टूट भी चुकी है। साल 2003 में इनमें बिखराव की शुरूआत हुई। जब भारत सरकार से बातचीत के मुद्दे पर सैय्यद अली शाह गिलानी और मीरवाइज अलग हो गए। सैय्यद का ग्रुप यह चाहता कि भारत सरकार से कोई भी बातचीत न हो जबकि मीरवाइज बातचीत के पक्षधऱ थे। मीरवाइज वाजपेयी सरकार के कश्मीर को लेकर बनाए गए फार्मूले पर बातचीत को तैयार थे।
एक आरटीआई में यह बात सामने आई है कि इनकी सुरक्षा पर हर साल सरकार 10 करोड़ रुपए खर्च करती है। इसमें उनको दी जाने वाली सुरक्षा और सुविधा शामिल है। यह महंगी गाड़ियों में घूमते हैं। दूसरों को पत्थरबाजी के लिए उकसाने वाले इन अलगाववादियों में कई के बेटे-बेटी विदेशों में रहते हैं जबकि कई तो सरकारी नौकरी भी करते हैं।
मीरवाइज की सुरक्षा सबसे महंगी
सरकार मीरवाइज की सुरक्षा में सरकार हर साल लगभग 5 करोड़ रुपए खर्च कर रही है। यह खुलासा पिछले साल फरवरी में विधानसभा में पेश एक रिपोर्ट में हुआ था। यह राज्य में वीवीआईपी सुरक्षा में होने वाले खर्च का 10 प्रतिशत है।
अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी
सैय्यद अली शाह गिलानी के सुरक्षा का खर्च भी सरकार ही उठाती है। आज जारी हुई लिस्ट में इनका नाम शामिल नहीं है। यानि इनको दी गई सुरक्षा अभी जारी रहेगी। गिलानी के पास निजी स्टाफ की भारी भरकम फौज है। गिलानी का घर बहुत आलीशान है।
शब्बीर शाह भी है अमीर
कश्मीर में अलगाववाद को हवा देने वाले शब्बीर शाह भी कम धनवान नहीं है। इसके पास भी अकूत संपत्ति है। एनआईए ने अपनी जांच में इनकी संपत्तियों का भी व्योरा लिखा है। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार शब्बीर शाह की कुल संपत्ति लगभग 5 करोड़ के आस-पास बताई जाती है। यह एक होटल का भी मालिक है।
जेकेएलएफ का चीफ यासीन मलिक कभी रेहड़ी चलाकर गुजर बसर किया करता था। आज इसकी संपत्ति कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार 150 करोड़ रुपए से ज्यादा की है। कहा जाता है कि श्रीनगर के सबसे महंगे इलाकों में से एक लाल चौक में इसकी सबसे ज्यादा अचल संपत्ति है। यह श्रीनगर के रेजीडेंसी होटल का मालिक भी है।