मलाल रहेगा कि मां के मुंह से बेटा नहीं सुन पाया। उनके साथ बैठकर उनके हाथ का खाना नहीं खा पाया। जेल से बाहर आकर कई रातों तक छत पर जाता रहा क्योंकि मैं ऐसी दुनिया से लौटा था जहां चांद-सितारे देखने को नहीं मिलते थे। कई रातों तक उन्हें देखकर ये महसूस करने की कोशिश की कि हां अब मैं आजाद हूं। बाहर निकला तो जिंदगी एक खाली मैदान की तरह थी। कोई सहारा नहीं था किसी तरह का। मेरे ऊपर जिम्मेदारियां बहुत थीं। कर्ज भी था। मां का इलाज भी करवाना था। अक्सर ये देखा गया है कि जब कोई आतंकवाद के मुकदमे में गिरफ्तार होता है तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में कई दिन तक वो सुर्खियों में रहता है। उसके परिवार को भी इसका खमियाजा भुगतना पड़ता है।
जितनी मेरी उम्र थी, उससे ज्यादा मुझ पर मुकदमे दायर किए गए थे। मुझे पता नहीं था कि कब बाहर निकल सकूंगा लेकिन उम्मीद थी कि एक दिन निर्दोष साबित हो जाउंगा। मेरी जब रिहाई हुई तो मीडिया के माध्यम से ही सिविल सोसाइटी को मेरे बारे में पता चला और उन्होंने मेरी मदद की। लेकिन जो मदद मेरे या मेरे जैसे निर्दोष लोगों की सरकार को करनी चाहिए थी मुआवजे और पुनर्वास को लेकर, वो नहीं होती है। लेकिन इस कमी को किसी तरह सिविल सोसाइटी ने भरा। आज एक गैर-सरकारी संस्थान में मैं काम कर रहा हूं।
लेकिन मैं एक सवाल उठाना चाहता हूं। देश में एक नीति है चरमपंथियों के आत्मसमर्पण के लिए। अगर वो आत्मसमर्पण करते हैं तो उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने के लिए सरकार उनकी मदद करती है । ये अच्छी नीति है, मैं इसका पक्षधर हूं। लेकिन जिन भारतीय नागरिकों को गैर-कानूनी तरीके से उठाया जाता है, फर्जी केस बनाए जाते हैं उनके खिलाफ और जो लंबे वक्त तक बेवजह जेल की चारदीवारी भोगते हैं, उनकी जिंदगी दोबारा शुरू करवाने के लिए क्या करती है सरकार? ऐसे निर्दोष लोगों के लिए तो कोई कानून या नीति नहीं है।
ल में जाने के बाद मेरे पास दो ही रास्ते थे। एक तो ये कि मैं ये सब देखकर रोऊं या दूसरा ये कि इन कठिन हालातों से निकलने के लिए आगे बढूं। मैंने दूसरा रास्ता चुना। मेरे मां-बाप मेरे साथ थे। मेरी बेगुनाही मुझे पता थी। मैं खुद को 5 साल का मानता हूं क्योंकि रिहा हुए 5 साल हुए हैं। इतने वक्त में दुनिया की तकनीक भी बदल गई है। मोबाइल फोन आ गए, इंटरनेट आ गया, मेट्रो आ गई।
हमारे भारत का कानून और संविधान बहुत अच्छा है। कमी है उसको ठीक से लागू करने में। छोटे कीट-पतंगे मकड़ी के जाल में फंस जाते हैं लेकिन बड़ी मक्खियां जाल तोड़ कर निकल जाती हैं। हमारे कानूनी सिस्टम में गरीब, असहाय, अशिक्षित लोग फंस जाते हैं लेकिन पैसे और प्रभाव वाले निकल जाते हैं। नेशनल ह्यूमन राइट कमीशन का शुक्रिया करना चाहूंगा कि उनके इस कदम से मुझे मुआवजा मिलना संभव हो पाया। 5 लाख, 50 लाख या 5 करोड़, इन 14 साल की भरपाई नहीं कर सकते हैं लेकिन जख्मों पर मरहम का काम कर सकते हैं। ये तो पहला कदम है और मेरे जैसे दूसरे आमिर भी हैं जिनके जख्मों को मरहम की जरूरत है। उन्हें दोबारा जिंदगी दिए जाने की जरूरत है।