फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

1998 सीरियल बम ब्लास्ट में गिरफ्तार हुए थे आमिर खान, खुद को निर्दोष साबित करने में लग गए 14 साल

Tue, 10 Apr 2018 04:02 PM IST
बीबीसी, हिंदी
विज्ञापन
विज्ञापन

मोहम्मद आमिर खान को 1998 में दिल्ली पुलिस ने सीरियल बम ब्लास्ट मामलों में अभियुक्त बनाया था। 2012 में कोर्ट ने उन्हें सभी मामलों से बरी कर दिया। उसके 4 साल बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के आदेश पर दिल्ली पुलिस को उन्हें 5 लाख का मुआवजा देना पड़ा। बीबीसी से बातचीत में आमिर ने बताया कि उन्हें क्या झेलना पड़ा।

विज्ञापन


पढ़िए आमिर की ज़ुबानी

मैं फरवरी 1998 की वो रात नहीं भूल सकता जिसने मेरी और मेरे परिवार की जिंदगी पूरी तरह बदल दी। मेरे घर के पास ही एक सुनसान रोड पर एक जिप्सी रुकी और कुछ लोग मेरे हाथ-पैर बांध कर, आंखों पर पट्टी बांध कर गाड़ी में डाल कर ले गए। सब लोग सिविल ड्रेस में थे। मुझे लगा कि मुझे अगवा किया गया है। मैं सपने में भी नहीं सोच सकता था कि ये पुलिस वाले हो सकते हैं। मुझे एक कमरे में ले जाकर खड़ा कर दिया, मेरे सारे कपड़े उतार दिए गए और टॉर्चर का सिलसिला शुरू हुआ। 7 दिन तक मुझे गैर-कानूनी तरीके से हिरासत में रखा। उसके बाद मेरे पास 100-150 पेपर लेकर आए और जबरन दस्तख्त कराने की कोशिश की। इतने दिन के टॉर्चर के बाद भी मैंने विरोध किया। लेकिन नतीजा ये हुआ कि मेरे हाथ-पैर के नाखून तक निकाल लिए गए और मजबूरन मुझे साइन करना पड़ा। 1996-97 में दिल्ली-एनसीआर में जो ब्लास्ट हुए थे, उन सबमें मुझे दोषी बनाया गया था। तब मैं सिर्फ 18 साल का था।

ये गिरफ्तारी नहीं, अपहरण था

मैं कभी नहीं कहता कि मेरी गिरफ्तारी हुई थी। गिरफ्तारी उसको कहते हैं जब कानून के तहत किसी को पकड़ा जाए, किसी राह चलते को उठा लेना गिरफ्तारी नहीं होती। इस 'अपहरण' से पहले मैं पुरानी दिल्ली के एक हंसते-खेलते परिवार का लड़का था। पायलट बनने के ख्वाब देखता था। 14 साल जेल काटने के बाद घर लौटा तो पिता जी नहीं थे। इस दौरान उनकी मौत हो गई थी। उनको आखिरी बार देखने के लिए पेरोल या जमानत तक नहीं मिली थी। कब्रिस्तान जाता हूं तो मुझे ये भी नहीं पता कि उनको दफनाया कहां गया है। बस एक कोने में खड़ा होकर उनके लिए दुआ मांगता हूं। मेरी मां पेरालिसिस का शिकार हो चुकी थी। इस हालत में थीं कि मुझे देखकर 'बेटा' तक नहीं बोल पाईं। परिवार को सामाजिक बहिष्कार भी झेलना पड़ा। आखिर एक 'देशद्रोही' के परिवार से कौन संबंध रखना चाहेगा। कोई भी ऐसे घर जाने से बचेगा जिससे उसे थाने का दरवाजा देखना पड़े।

विज्ञापन

मेरी उम्र से ज्यादा मुझ पर मुकदमे थे

मलाल रहेगा कि मां के मुंह से बेटा नहीं सुन पाया। उनके साथ बैठकर उनके हाथ का खाना नहीं खा पाया। जेल से बाहर आकर कई रातों तक छत पर जाता रहा क्योंकि मैं ऐसी दुनिया से लौटा था जहां चांद-सितारे देखने को नहीं मिलते थे। कई रातों तक उन्हें देखकर ये महसूस करने की कोशिश की कि हां अब मैं आजाद हूं। बाहर निकला तो जिंदगी एक खाली मैदान की तरह थी। कोई सहारा नहीं था किसी तरह का। मेरे ऊपर जिम्मेदारियां बहुत थीं। कर्ज भी था। मां का इलाज भी करवाना था। अक्सर ये देखा गया है कि जब कोई आतंकवाद के मुकदमे में गिरफ्तार होता है तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में कई दिन तक वो सुर्खियों में रहता है। उसके परिवार को भी इसका खमियाजा भुगतना पड़ता है।

जितनी मेरी उम्र थी, उससे ज्यादा मुझ पर मुकदमे दायर किए गए थे। मुझे पता नहीं था कि कब बाहर निकल सकूंगा लेकिन उम्मीद थी कि एक दिन निर्दोष साबित हो जाउंगा। मेरी जब रिहाई हुई तो मीडिया के माध्यम से ही सिविल सोसाइटी को मेरे बारे में पता चला और उन्होंने मेरी मदद की। लेकिन जो मदद मेरे या मेरे जैसे निर्दोष लोगों की सरकार को करनी चाहिए थी मुआवजे और पुनर्वास को लेकर, वो नहीं होती है। लेकिन इस कमी को किसी तरह सिविल सोसाइटी ने भरा। आज एक गैर-सरकारी संस्थान में मैं काम कर रहा हूं।
विज्ञापन

निर्दोष के लिए क्या करती है सरकार?

लेकिन मैं एक सवाल उठाना चाहता हूं। देश में एक नीति है चरमपंथियों के आत्मसमर्पण के लिए। अगर वो आत्मसमर्पण करते हैं तो उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने के लिए सरकार उनकी मदद करती है । ये अच्छी नीति है, मैं इसका पक्षधर हूं। लेकिन जिन भारतीय नागरिकों को गैर-कानूनी तरीके से उठाया जाता है, फर्जी केस बनाए जाते हैं उनके खिलाफ और जो लंबे वक्त तक बेवजह जेल की चारदीवारी भोगते हैं, उनकी जिंदगी दोबारा शुरू करवाने के लिए क्या करती है सरकार? ऐसे निर्दोष लोगों के लिए तो कोई कानून या नीति नहीं है।

ल में जाने के बाद मेरे पास दो ही रास्ते थे। एक तो ये कि मैं ये सब देखकर रोऊं या दूसरा ये कि इन कठिन हालातों से निकलने के लिए आगे बढूं। मैंने दूसरा रास्ता चुना। मेरे मां-बाप मेरे साथ थे। मेरी बेगुनाही मुझे पता थी। मैं खुद को 5 साल का मानता हूं क्योंकि रिहा हुए 5 साल हुए हैं। इतने वक्त में दुनिया की तकनीक भी बदल गई है। मोबाइल फोन आ गए, इंटरनेट आ गया, मेट्रो आ गई।

हमारे भारत का कानून और संविधान बहुत अच्छा है। कमी है उसको ठीक से लागू करने में। छोटे कीट-पतंगे मकड़ी के जाल में फंस जाते हैं लेकिन बड़ी मक्खियां जाल तोड़ कर निकल जाती हैं। हमारे कानूनी सिस्टम में गरीब, असहाय, अशिक्षित लोग फंस जाते हैं लेकिन पैसे और प्रभाव वाले निकल जाते हैं। नेशनल ह्यूमन राइट कमीशन का शुक्रिया करना चाहूंगा कि उनके इस कदम से मुझे मुआवजा मिलना संभव हो पाया। 5 लाख, 50 लाख या 5 करोड़, इन 14 साल की भरपाई नहीं कर सकते हैं लेकिन जख्मों पर मरहम का काम कर सकते हैं। ये तो पहला कदम है और मेरे जैसे दूसरे आमिर भी हैं जिनके जख्मों को मरहम की जरूरत है। उन्हें दोबारा जिंदगी दिए जाने की जरूरत है।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें